दुर्ग (अमर छत्तीसगढ़) 9 जुलाई। “मन भौतिक पदार्थों में सुख होने की धारणा बनाता है, परिस्थिति के आधार पर मनःस्थिति बदलती है. मनःस्थिति के कारण ही सुख-दुख की अनुभूति होती है। मन स्वीकार करें वह सुख और जिसे अस्वीकार करे दें वह दुख बन जाता है।
यह मन की विडम्बना है कि भौतिक पदार्थों में सुख की अनुभूति का अहसास करता है, यह शत-प्रतिशत भ्रमणा है,सच्चा सुख तो परमात्मा द्वारा बताये गए मार्ग को अपनाने से ही प्राप्त होगा उक्त उद्गार श्री उवसग्गहरं पार्श्व तीर्थ नगपुरा में चातुर्मास आराधको को संबोधित करते हुए पू. साध्वी श्री लक्ष्ययशा श्री जी म.सा. ने व्यक्त की।
उन्होंने कहा कि “सम्यक् दर्शन-ज्ञान-चारित्राणि मोक्षमार्गः” का अर्थ मोक्ष का मार्ग सम्यक दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र का अनुपालन से ही तैयार होता है अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति के लिए सम्यक रूप से श्रद्धा ज्ञान और चारित्र की आचरण तीनों ही जरूरी है। चातुर्मास का पर्व आत्मजागृति का पर्व है, आत्मा से परिचित होने, आत्मा को पहचानने, के लिए इन दिनों हम जप तप त्याग तपस्या से
जुड़ने का प्रयास करें। चातुर्मास आराधना विनाश से विकास, वासना से उपासना, पुण्य से शिखर की यात्रा है,चार गति का क्षय करने के लिए पुरुषार्थ करना, तृष्णा को छोड़कर रत्नत्रयी की आराधना करना, मर्यादा रखना, व्रत नियमों के अनुपालन में निमग्न रहना,सम्यकत्व की प्राप्ति का पुरुषार्थ करना,यह हमारे चातुर्मास आराधना का लक्ष्य होना चाहिए ।
मन में पुरूषार्थ करने का विचार हो तो, सामर्थ्य खुद- ब -खुद आ जाता हैं
—– साध्वी आज्ञायशाश्रीजी–
प्रवचन श्रृंखला में धर्म सभा को संबोधित करते साध्वी श्री आज्ञायशाश्रीजी म सा ने कहा कि “आत्मा ही परमात्मा है, प्रत्येक आत्मा में परमात्मा बनने की शक्ति है।
सम्यक ज्ञान के अभाव में जीव भवोभव तक भटकते रहता है, जन्म -जरा -मृत्यु के निवारण में सम्यक ज्ञान ही आलंबन है, चातुर्मास में बारिश होती है, वरसात का जल पहाड़ और भूमि दोनों पर गिरती है,एक ओर पत्थर के कारण पहाड़ से जल बह जाती है, वहीं मिट्टी के कारण भूमि जल अवशोषित कर लेती है, चातुर्मास में प्रवचन की अमीवर्षा होगी मन मिट्टी बनाकर जिनवाणी को हृदय समाहित करना है।
मन में पुरूषार्थ करने की भावना हो तो हममें आराधना करने के लिए सामर्थ्य पैदा होगी ,भाव और क्रिया एक सिक्का का दो पहलू है, एक-दूसरे के बिना सिक्का का अस्तित्व नहीं है. अकेले भाव होने से या अकेले क्रिया करने से मार्ग प्राप्त नहीं होगा, भाव और क्रिया जब दोनो मिलते है तब मोक्ष का मार्ग बनता है।
शाश्वत सुख की प्राप्ति के लिए सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र तीनों जरूरी है। इसके लिए परमात्मा के द्वारा बताये मार्ग, सिद्धांत पर हमें श्रद्धा और समर्पण रखना होगा। समर्पण के अभाव में हमें अपने वास्तविकता का बोध नहीं होता है। भावना के साथ पुरुषार्थ आवश्यक है बिना पुरुषार्थ भावना फलीभूत नहीं हो सकती।
*दि 10 जुलाई को गुरू पूर्णिमा के अवसर पर प्रवचन श्रृंखला में प्रातः स्मरणीय श्री गौतम स्वामी जी, श्री सुधर्मा स्वामी जी, अकबर प्रतिबोधक जगद् गुरू श्री हीरसूरीजी, कविकुल किरीट श्री लब्धिसूरीजी आदि गुरु भगवंतो का यशोगानयुक्त गुणानुवाद किया जावेगा।

