भीलवाड़ा (अमर छत्तीसगढ) ,30 जुलाई। हमारे धर्म द्वारा प्रदान मंत्रों की शक्ति को पहचाने। मौन जाप सबसे बड़ा जाप है जिसमें होंट भी नहीं हिलते है। जैन धर्म में नवकार महामंत्र ओर उवसग्ग्हरं स्रोत के बाद सबसे महत्वपूर्ण भक्तामर स्रोत सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला मंत्र है। इन मंत्र की साधना आपकी श्रद्धा व साता वेदनीय कर्म हो तो सार्थक हो जाती है।

ये विचार अनुष्ठान आराधिका ज्योतिष चन्द्रिका महासाध्वी डॉ. कुमुदलताजी म.सा. ने आध्यात्मिक चातुर्मास आयोजन समिति द्वारा सुभाषनगर श्रीसंघ के तत्वावधान में दिवाकर कमला दरबार में बुधवार प्रवचन में व्यक्त किए।
उन्होंने बताया कि गुरूवार को सुबह 8.45 से 10 बजे तक होने वाले अनुष्ठान में भक्तामर स्रोत के 45वें श्लोक‘‘उद्भुत भीषण जलोदर भार भुग्ना’’ की आराधना हमारे लिए क्यों महत्वपूर्ण है ओर इसका क्या प्रभाव हमारे जीवन पर होता है।

इस श्लोक की पूर्ण श्रद्धा व भक्ति के साथ आराधना आरोग्यता प्रदान करती है ओर कैंसर जैसे गंभीर रोगों से पीड़ितों को भी साता व राहत देता है। इस श्लोक की आराधना शरीर से जलोदर जैसे रोग ठीक कर देती है।
साध्वी कुमुदलताजी म.सा. ने कहा कि हमारा किसी के साथ स्नेहाबंध ओर किसी के साथ वैरबंध होता है। जिसके साथ स्नेह उसे असाता हो तो हम भी पीड़ित हो जाते ओर जिसके साथ वैर उसे असाता हो तो हम साता महसूस करने लगते।
हम किसी को साता नहीं दे सकते तो असाता ओर अंतराय भी नहीं दे। ऐसा करने पर अनंत कर्मो का बंध होता है। अंतराय कर्म क्षय होने पर केवल ज्ञान ओर मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। उन्हांेंने कहा कि जो वर्षावास में जिनवाणी का लाभ उठा रहे है वह पुण्यशाली है।

जिन्होंने समय का महत्व समझा वह महावीर, शालिभद्र ओर राम बन गए। जीवन में किसी भी परिस्थति में धर्म का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। स्वर साम्राज्ञी महासाध्वी महाप्रज्ञाजी म.सा.ने प्रेरणादायी भजन ‘‘मां-पिता से पाया ये जीवन,ये ना कभी हम भूलाएं’’ की प्रस्तुति दी।
धर्मसभा में वास्तुशिल्पी पद्मकीर्तिजी म.सा. ने सुखविपाक सूत्र का वाचन करते हुए छठे एवं सातवें अध्याय के माध्यम से जीवन में छह एवं सात के अंक का महत्व बताया।

उन्होंने कहा कि छह काय के प्रतिपालक को सभी वंदन नमन करते है। छह तरह के कर्कश वचन जीवन में कभी नहीं बोलने चाहिए। भय,वचन ओर नारकीय सात-सात तरह के होते है।
हमे ओर आपको परमात्मा का साथ मिल जाएगा तो मोक्ष का भी साथ मिल जाएगा। इसके लिए हमे शुभ कर्मो का साथ भी चाहिए। कर्म बुरे होंगे तो मोक्ष नहीं मिलेगा।

उन्होंने कहा कि हमारी भलाई कुछ लोगों तक सीमित नहीं रहकर उस बारिश व सूर्य के समान होनी चाहिए जिसका लाभ सभी को मिले। दूसरों के लिए भलाई सोचने वाले का भला अवश्य होता है। धर्मसभा में विद्याभिलाषी साध्वी राजकीर्तिजी म.सा. का भी सानिध्य प्राप्त हुआ।
धर्मसभा में कई श्रावक-श्राविकाओं ने बेला, उपवास, आयम्बिल, एकासन आदि तप के प्रत्याख्यान भी लिए। धर्मसभा में अतिथियों का स्वागत आध्यात्मिक चातुर्मास आयोजन समिति एवं सुभाषनगर श्रीसंघ द्वारा किया गया।
लक्की ड्रॉ भी निकाल भाग्यशाली विजेता को पुरस्कृत किया गया। धर्मसभा का संचालन चातुर्मास सचिव के सचिव राजेन्द्र सुराना ने किया।
धर्मसभा में भीलवाड़ा के विभिन्न क्षेत्रों सहित कई स्थानों से आए श्रावक-श्राविकाएं मौजूद थे। नियमित चातुर्मासिक प्रवचन सुबह 8.45 से 10 बजे तक हो रहे है।

श्रावक-श्राविकाओं को दी जा रही तेला तप करने की प्रेरणा
चातुर्मास में पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व शुरू होने पर 20 से 22 अगस्त तक होने वाली सामूहिक तेला तप आराधना की जाएगी। महासाध्वी मण्डल द्वारा प्रतिदिन श्रावक-श्राविकाओं को अधिकाधिक तेला तप करने की प्रेरणा दी जा रही है। तेला तपस्वियों के लक्की ड्रॉ भी निकाले जाएंगे।
चातुर्मासिक आयोजनों के तहत 3 अगस्त को मरूधर केसरी मिश्रीमलजी म.सा. एवं लोकमान्य संत वरिष्ठ प्रवर्तक रूपचंदजी म.सा. की जयंति पर गुणानुवाद दिवस मनाया जाएगा। इसी तरह रक्षाबंधन के उपलक्ष्य में 10 अगस्त को विशेष कार्यक्रम होंगा।
स्वाधीनता दिवस के उपलक्ष्य में पूर्व संध्या पर 14 अगस्त को दोपहर 1.30 बजे से देशभक्ति के गीतों पर आधारित प्रतियोगिता होगी। ये प्रतियोगिता तीन आयु वर्ग 7 से 12, 13 से 21 एवं 21 वर्ष से अधिक उम्र वर्ग में होगी। इसी तरह 16 अगस्त को कृष्ण जन्मोत्सव पर बच्चों के लिए विशेष आयोजन होगा।
निलेश कांठेड़
मीडिया प्रभारी
आध्यात्मिक चातुर्मास आयोजन समिति, सुभाषनगर, भीलवाड़ा
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