प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि उनको मिले हुए सत्ता, सम्पत्ति और शक्ति शाश्वत बन जायें- साध्वी श्री लब्धियशा श्री

प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि उनको मिले हुए सत्ता, सम्पत्ति और शक्ति शाश्वत बन जायें- साध्वी श्री लब्धियशा श्री

नगपुरा(अमर छत्तीसगढ़) 21 जुलाई। श्री उवसग्गहरं पार्श्व तीर्थ नगपुरा में चातुर्मास रविवारीय विशेष प्रवचन श्रृंखला अंतर्गत पूज्य साध्वी श्री लब्धियशा श्री जी म.सा. ने कहा कि “प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि उनको मिले हुए सत्ता, सम्पत्ति और शक्ति शाश्वत बन जायें लेकिन यह संभव नहीं है, समय के पाश से सभी बंधे हुए हैं।

शरीर है , इसलिए प्रत्येक वस्तु की मर्यादा है। शरीर की मर्यादा है। प्रत्येक व्यक्ति को कभी ना कभी शरीर को त्यागकर ,आयुष की मर्यादा का वरण करना होगा। कालचक्र में सबकी मर्यादा सन्निहित है।

जब शरीर ही नश्वर है तब शरीर से जुड़े सुख की परिकल्पना का आधार सत्ता, सम्पत्ति और शक्ति कैसे शाश्वत होगा। विडम्बना है कि व्यक्ति मृत्यु से डरता है लेकिन पाप से मुक्त होने का प्रयत्न नहीं करता।


जो सत्य को समझता है वह मृत्यु को भी महोत्सव के रूप में स्वीकार करता है। समय रहते जो नहीं जागता उसके पास रोने के सिवाय कुछ नहीं बचता ,इसलिए महापुरुषों ने समय की महत्व को बतलाते हुए जीवन के प्रत्येक क्षण का आत्म अवलोकन कर आत्मशुद्धि की दिशा में पुरुषार्थ करने के लिए प्रेरित करते हैं।

महापुरूषों के गुणमय जीवन का परिचय हमें गुणवान बनने में सहायक होती है, इसलिए गृहस्थ जीवन में दादा, दादी, माता, पिता को चाहिए कि वे अपने नौनिहाल बच्चों को कहानी किस्सा के माध्यम से महापुरूषों के जीवन परिचय सुनायें।

बालमन गिली मिट्टी की तरह कोमल होता है ,जो आकृति देना चाहें, दिया जाना संभव है। बच्चों को बचपन में दी गई हितशिक्षा उनके जीवन में सदैव उपयोगी बनता है। बालमन में अंकित संस्कार जीवनपर्यन्त टिक सकता है। मनुष्य की मनःस्थिति आज संवेदना शून्य सा बन गया है।

संवेदना और औचित्यपूर्ण व्यवहार गृहस्थ का भूषण है। धर्म के नाम पर संवेदनाओं का नाश करता है वह व्यक्ति ढोंगी है और जो व्यवहार में भी संवेदनाओं को जीता है वह धार्मिक है। संस्कार अच्छा होगा तो दृष्टि भी सही होगी। विदेशी पर्यटक भारत भ्रमण के दौरान अनेकों मंदिरों को देखने जाते हैं, उनकी दृष्टि भगवान की मूर्ति पर कम रहता है ।

वे मंदिर में उत्कीर्ण शिल्प कला को देखकर खुश होते हैं वहीं भारतीय व्यक्ति मंदिर कितना भी सुंदर हो, कलात्मक हो सबसे पहले परमात्मा को दर्शन करता है, स्थान एक ही है, दर्शन की प्रक्रिया एक है लेकिन परिणाम अलग-अलग होता है एक के लिए परमात्मा को देखने में आनंद तो दूसरा कलाकृति को देखकर खुश।”

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