नगपुरा/ दुर्ग (अमर छत्तीसगढ) 22 जुलाई। श्रमण भगवान श्री महावीर स्वामी ने श्री आचारांग सूत्र में फरमाया कि इच्छा और लोभ से बचें। इच्छा अनंत है, इसकी पूर्ति संभव नहीं है, एक इच्छा की पूर्ति होते ही- दूसरी इच्छा जागृत हो जाती है, मन पर नियंत्रण जरूरी है। लोभी व्यक्ति मूर्च्छा से ग्रसित होता है।
धन के प्रति आसक्ति, पदार्थ के प्रति आसक्ति, इनके प्रति ममत्व, इनके प्रति मोह मूर्च्छा है” उक्त उद्गार साध्वी श्री लब्धियशा श्री जी म० सा० ने चातुर्मास प्रवचन माला में व्यक्त किए।
लोभ को परिभाषित करते हुए साध्वी जी ने कहा लोभ सभी कषायों में भयंकर कषाय है। संसार के अधिकांश पाप लोभ के कारण होते हैं। लोभ से पाप उत्पन्न होता है और पाप व्यक्ति को विनाश की ओर ले जाता है।
लोभ इंसान के सोचने समझने की शक्ति को कमजोर कर देता है, लोभ के वशीभूत व्यक्ति सही और गलत का भेद भूल जाता है। लोभ की प्रवृत्ति मनुष्य को हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रही जैसे पापों के लिए प्रेरित करता है। बाहय पदार्थो के प्रति ममत्व एवं तृष्णा की बुद्धि लोभ है।
लालच एक ऐसा अवगुण होता है जो इंसान के भीतर हर दिन बढ़ता ही जाता है। जब तक वह उस इंसान का पतन नहीं कर देता है।जब किसी भी व्यक्ति के भीतर लालच का जन्म होता है, तो वह सबसे पहले उसके सुख और संतुष्टि को खत्म कर देता है।

साध्वीजी ने श्री सिद्धर्षि गणि रचित उपमितिभव प्रपंच, श्री हरिभद्र सूरीजी रचित ललित विस्तरा, श्री उमास्वाति जी रचित ‘तत्वार्थसूत्र’ के श्लोको का उदाहरण देते हुए बतलाया कि सम्पति के साथ सद्बुद्धि जरूरी है। धनवान व्यक्ति भी अपरिग्रही हो सकता है, इसके विपरीत निर्धन, भिखारी भी मूर्च्छा के कारण परिग्रह का पाप बांध लेता है।
उन्होने कहा कि वैराग्यशतक ग्रंथ में वर्णन है कि संसार में व्याधि और वेदना प्रचुर है, संसार दुःखो का महासागर है। संसार असार है, यह जानते हुए भी जीव मूर्च्छा से ग्रसित है। श्री दशवैकालिक सूत्र में तप को कर्म निर्जरा का साधन बतलाया गया है।

