देशनोक राजस्थान (अमर छत्तीसगढ) रामजन्म भूमि में श्री जैन जवाहर मण्डल प्रांगण में धर्म सभा में परम श्रद्धेय आचार्य श्री 1008 रामलालजी म.सा. एवं उपाध्याय प्रवर श्री राजेश मुनिजी म.सा. एवं शासन दिपक श्री प्रकाश मुनिजी एवं श्री विनय मुनिजी के साथ साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका से विशाल भरे पांडाल पर्युषण पर्व के संवत्सरी दिवस पर धर्म सभा में विराजना हुआ।
शासन दीपक शोभन मुनिजी अन्तगडदसा सूत्र के छठे वर्ग के 14 वां अध्ययन का वांचन करते हुए बताया उस काल उस समय में राजगृह नगर था। उस नगर में श्रेणिक राजा राज्य करते थे। काश्यम गाथापति आदि प्रभु महावीर की देशना सुनकर दीक्षा ली। सभी ने सिद्ध गति को प्राप्त किया।
उस काल उस समय में पोलासपुर नामक नगर था। उस नगर में विजय नाम का राजा था। उनका अतिमुक्त कुमार पुत्र था। उस नगर में ग्रामानुग्राम विचरते हुए श्रीवन उद्यान में अरिहंत भगवान महावीर पधारे। उनके ज्येष्ठ शिष्य इन्द्रभुति गौतम तेले की पारणे की आज्ञा लेकर मिक्षार्थ हेतु निकले।
अतिमुक्त कुमार अनेक बालक, बालिकाओं, कुमारों, कुमारियों आदि के साथ खेल (क्रीडा) करने लग जाते है। अतिमुक्त कुमार की नजर इन्द्रभूति गौतम पर पड़ती है वे उनके पास पहुचंते है। आप कौन है क्यों घूम रहे है? सारी बात की जानकारी लेकर अतिमुक्त कुमार ने कहा आप मेरे साथ चले भिक्षा दिलाता हूं। वे अपने यहां ले जा रहे थे, माता श्री देवी यह देख हर्षित होती है तीन बार उन्हें वंदन नमन करती है। फिर आहार बहरा कर उन्हें विदा करती है।
अतिमुक्त कुमार इन्द्रभूति गौतम से प्रार्थना करते है, मैं भी आपके साथ अरिहंत भगवान महावीर के दर्शनार्थ चलूंगा। अतिमुक्त कुमार ने भगवान महावीर को तीन बार वंदन किया। फिर प्रभु की धर्म देशना सुनकर कहा मैं निर्ग्रन्ध प्रवचन पर श्रद्धा रखता हूं। माता-पिता से आज्ञा लेकर आपके पास दीक्षा लूंगा।
अतिमुक्त कुमार माता-पिता से अनुमति मांगते है। बेटा अभी तुम बालक हो। अभी समझते नहीं हो। अतिमुक्त कुमार ने कहा- मैं जिसे जानता हूं उसे ही नहीं जानता हूं तथा जिसे नहीं जानता हूं उसे ही जानता हूं? फिर माता-पिता से कहा जन्मे हुए की मृत्यु होती है। मैं नहीं जानता कि किया कर्मों के कारण जीव नरक, तिरयंच, मनुष्य और देवगति में उत्पन्न होते हैं। आप मुझे
दीक्षा लेने की आज्ञा दे। तब माता-पिता ने कहा बेटा एक दिन के लिए राज सिहासन में हम तुम्हें बिठाना चाहते है। यह सुनकर वचनों का पालन करते है। फिर आज्ञा देकर रजोहरण, पात्र आदि एवं नाई को बुलाकर भगवान महावीर के पास दीक्षा ग्रहण करते है। भगवान महावीर की आज्ञा लेकर विपुल पर्वत पर संथारा लेते है और सिद्ध गति को प्राप्त कर लेते है।
शासन दीपक शोभन मुनिजी ने सातवे आठवे वर्ग का भी वाचन करते हुए धर्म सभा में कहा इसमें 13 अध्ययन भगवान महावीर ने फरमाए है, उस काल उस समय राजगृह नामक नगर था। वहा श्रेणिक राजा राज्य करते थे। इनकी नंदा नाम क महारानी थी। भगवान महावीर का ग्रामानुग्राम विचरते हुए गुणशील उद्यान में पदार्पण हुआ।
नंद रानी भगवान महावीर के समाचार जानकर उनके दर्शन करने गई भगवान की उपदेशना सुनकर व भगवान से दीक्षा लेने के भाव रखी। श्रेणिक राजा से आज्ञा लेकर दीक्षा ग्रहण कर ली। 20 वर्ष संयम पालन कर अंत में संथारा लेकर सिद्ध गति को प्राप्त कर ली। आठवे वर्ग में भगवान महावीर ने 10 अध्ययन फरमाए है।
उस काल उस समय चम्पा नामक नगरी थी, वहा कोणिक राजा राज्य करते थे, उनकी छोटी माता काली महारानी थी। वह भगवान महावीर के दर्शन एवं उपदेश सुनकर दीक्षा ग्रहण की, वह आर्यचंदना से आज्ञा लेकर (रत्नावली) तप की।
इसी तरह सुकाली कनकावली तप किया। महाकाली ने लघुसिंह निष्कीड़ित तप किया। कृष्णा ने (महासिंहनिष्कीड़ित) तप किया। सुकृष्णा ने सप्तसप्तमिका (भिक्षु) तप किया।
महाकृष्णा लघुसर्वतोभद्र तप किया, वीर कृष्णा ने महासर्वतोभद्र तप किया। रामकृष्णा ने भद्रोतरप्रतिमा तप किया। पितृसेन कृष्णा ने मुक्तावली तप किया। महासेन कृष्णा ने आयम्बिल वर्धमान तप किया। ये सभी तप कर संथारा ग्रहण कर सिद्ध गति को प्राप्त कर लेती है।
अशोक सुराणा ने बताया यह अन्तगडदसाओं सूत्र को पर्युषण पर्व पर साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका को वाचनी हेतु आचार्य प्रवर 1008 श्री रामलालजी म.सा. के तत्वाधान में यह सूत्र नवीनता के साथ संघ को प्राप्त हुआ है. इसमें 90 महान आत्माओं का जीवन के वर्णन किया गया है। इसमें अरिहंत भगवान अरिष्टनेमि एवं अरिहंत भगवान महावीर के काल के समय की घटना को बहुत ही सुंदर ढंग से बताया गया है।

