जीवन सार्थक बनाना है तो ब्रह्ममुहुर्त को साधिए- शासन दीपक श्री विनय मुनि

जीवन सार्थक बनाना है तो ब्रह्ममुहुर्त को साधिए- शासन दीपक श्री विनय मुनि

ब्यावर राजस्थान (अमर छत्तीसगढ़) 25 अगस्त।
आचार्य श्री रामेश के शिष्य ब्यावर रत्न शासन दीपक श्री विनय मुनि जी म.सा.ने आज सुबह खचाखच भरे समता भवन के प्रवचन हाल मे अपनी अमृत देशना शुरु करते हुए कहा हुक्मसंघ के उदयवान नक्षत्र आचार्य भगवन और बहुश्रुत वाचनाचार्य को वंदन नमन करते हुए आज के प्रवचन का सार उठिए न कमाइये पर कहा हमें ब्रह्ममुहुर्त पर उठना चाहिए जैसे ऋषि मुनि ब्रह्ममुहुर्त का साधते हुए धर्म जागरण में लग जाते थे,उस टाइम पोजेटिव ऊर्जा रहती है जिससे उनका मस्तिष्क तरोताजा रहता था।


म सा ने कहा जीवन में ऊर्जा वान बनना है तो ब्रह्ममुहुर्त को साधिए उठिए जाग्रत हो जाइए एक क्षण का प्रमाद मत करो उठिए न कमाइये। जो ब्रह्ममुहुर्त को साध लेता किसी कठिनाई में नहीं आता,विद्वान् पंडित एक एक क्षण का बहूमुल्य समझते थे,जितना आलस प्रमाद बढेगा उतनी बिमारियां बढ़ेगी। सम्यक ज्ञान आने पर नेगेटिव विचार चले जाते हैं।


म सा ने असंतुलित पर कहा जिसका मन बाहर से असंतुलित होता उसका परिवार बिखर जाता है हमें हमारे मन का संतुलित बनावें उसके लिए ब्रह्ममुहुर्त को साधना होगा तभी मन संतुलित बनेगा जैसे भगवान महावीर ने अनाड़ी क्षेत्र में जाकर तपस्या करी उन्हे कितना भी उपसर्ग आये पर अपने मन को संतुलित रखा,मंगलम भगवान् वीरों मंगलम गोतम प्रभो, मंगलम स्थुलभद्रा जैन धर्मोस्तु मंगलम।

इस पंचम दुखम आरे में चारो तरफ मिथ्यात्व का बोल बाला है उसके प्रति लोगों का झुकाव होता जा रहा है जो मनोरंजन वाला होता जा रहा हैं।


इससे पहले म सा ने कहा संसार की सर्वश्रेष्ठ संरचना मनुष्य जीवन है,यही मनुष्य जीवन प्रगति का पौधा है,हमें इस मनुष्य जीवन का महत्व समझना चाहिए नहीं तो कोई इस जीवन माइना नहीं रहेगा। प्रतिदिन हम इस आत्मा के लिए जिनवाणी का श्रवण कर रहे हैं, जिससे आत्मा में सम्यक ज्ञान का प्रकाश आ जाए और सम्यक ज्ञान प्राप्त कर सकें सम्यक ज्ञान, दर्शन , चरित्र यह तीन रत्नों को सुरक्षित रखता है,नहीं रखने पर लुटेरे चुरा लेता है।

हमें जिनवाणी का अलार्म लगाना होगा।
इससे पहले श्री दिव्यदर्शन जी म सा ने कहा सामने वाला प्रतिकार करता वो सामान्य व्यक्ति नहीं हो सकता,जो अपनी आत्मा को देख लेता वो सबसे वीर होता है,आज जीवन में व्यापार प्रतियोगिता का बन गया है,बिल्ले व्यक्ति ही इस प्रतियोगिता में धर्मात्मा बन जाते हैं।आज हमने बहुत अपेक्षाएं पाल रखी है इस कारण दुखी होते जा रहे हैं, क्योंकि पांचों इंद्रिया किसी की सुनती नहीं।


म सा ने कहा आज हर व्यक्ति के चेहरे पर तनाव होता जा रहा है,जैन दिखने में संतुष्ट नही होना चाहिए जैन सभ्यता विपरित बनते जा रही,जहां लालच देखा वही हम गिर जाते हैं।पहले जैन श्रावक का लेवल ऊंचा था आज पैसे के लिए नीचे बैठते जा रहे हैं। पांचों इंद्रियों पर कंट्रोल होने से धर्म कर सकते।अपने व्यक्तित्व को महान बनावें।
संघ प्रवक्ता
नोरतमल बाबेल
साधुमार्गी जैन संघ,ब्यावर।

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