‎कुविचार शरीर को और भी‎गंदा कर देते हैं – मौलिकप्रभ

‎कुविचार शरीर को और भी‎गंदा कर देते हैं – मौलिकप्रभ


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‎राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ़) 4 अक्टूबर । ” हमें कुप्रथाओं से बचना चाहिए और कुविचारों से भी। हमारा शरीर वैसे भी गंदा है और कुविचार हमारे शरीर को और भी गंदा कर देते हैं। हमें इस शरीर को और भी गंदा होने से बचाना है।” उक्त उदगार खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य मौलिकप्रभ सागर जी ने  व्यक्त किए।
‎              मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने बताया कि ज्ञान वल्लभ उपाश्रय भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में आज मुनि श्री मौलिकप्रभ सागर जी ने फरमाया कि हमें संभोग से भी बचना चाहिए। शेर भी अपने जीवन काल में एक बार ही संभोग करता है। उन्होंने कहा कि जब भी आपके दिमाग में कुविचार आए तो उसे त्याग दें। संयम जीवन ही असली जीवन है।
‎ मुनि श्री मौलिकप्रभ जी ने कहा कि दीक्षा के भाव ऐसे ही नहीं आते। कुछ चारित्रिक आत्माएं होती हैं जिन्हें संसार, असार लगने लगता है और वे स्वयं ही संयम जीवन की ओर बढ़ने लगते हैं। मुनिश्री ने कहा कि निमित्त मिलने के बाद शक्तिशाली आत्मा अपने में डूबी रहती है,उसे बाहरी दुनिया से कोई मतलब नहीं रहता और ना ही कोई उसे लुभा पाता है।

मुनि श्री ने कहा कि कहा कि खराब विचारों को त्याग दिया कीजिए। जब तक हम अध्ययन करते हैं तब तक हमें ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। 20 से 25 साल होने के बाद ही विवाह करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जैन शासन संयम पर ही आधारित है।

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