साध्वी लब्धियशाश्रीजी ने कहा कि प्रभु ने कषाय त्याग की प्रेरणा द्वारा दुःख मुक्ति का उपाय बताया

साध्वी लब्धियशाश्रीजी ने कहा कि प्रभु ने कषाय त्याग की प्रेरणा द्वारा दुःख मुक्ति का उपाय बताया

नगपुरा (अमर छत्तीसगढ) 17 जुलाई। प्रभु महावीर की प्रथम देशना श्री आचारांग आगम ग्रंथ का विवेचन करते हुए साध्वी लब्धियशाश्रीजी ने कहा कि प्रभु ने कषाय त्याग की प्रेरणा द्वारा दुःख मुक्ति का उपाय बताया है। क्रोध, मान, माया और लोभ ये चारो ही कषाय अशुभ कर्म बंध द्वारा आत्मा को दुःख के दलदल मे फंसा देते हैं।

जो साधक क्रोध को क्षमा द्वारा और मान को नम्रता द्वारा जीत लेता है, वही शाश्वत सुख की प्राप्ति कर पाता है। माया को सरलता द्वारा और लोभ को संतोष गुण द्वारा उपशांत किया जाता है।

साध्वी जी ने आराधको को हित शिक्षा देते हुए बतलाया कि भारतीय संस्कृति में भोग को नहीं बल्कि त्याग को महत्व दिया गया है। लोभ से प्रेरित होकर पदार्थों के संचय के लिए व्यक्ति असत्य- हिंसा आदी दोषों का आश्रय लेने से भी नहीं डरता। इसीलिए लोभ को पाप का बाप कहा जाता है।


साधक को आत्म कल्याण के लक्ष्य से अपने आप को दोषों, दुर्गुणों एवं कषायों से दूर रखना चाहिए ।
प्रभु महावीर ने इच्छाओ को आकाश के समान अनंत कहा है, क्योंकि पदार्थों की प्राप्ति के साथ इच्छाए निरंतर बढ़ती रहती हैं।

धन और पदार्थों की प्राप्ति से लाभ के बाद लोभ का विषचक्र चलते ही रहता है।
इच्छाओं का अंत संतोष गुण को आत्मसात करने पर ही हो सकता है। संतोषी नर सदा सुखी की लोकोक्ति भी लोभ कषाय के उपशमन का संदेश देती हैं।
लोभ मनुष्य के जीवन के पराभव का पतन द्वार है। षड्विकारों में लोभ मनुष्य के जीवन का ऐसा मानसिक विकार है, जो उसके उत्कर्ष में बाधा डालता है।

लोभी व्यक्ति आचरण से हीन हो जाता है ,वह अपने स्वाभिमान को भुलाकर किसी कामना के वशीभूत होकर चाटुकार बन जाता है, उसका अपना व्यक्तित्व नष्ट हो जाता है और किसी से कुछ पाने की आशा में अपना सब कुछ गंवा देता है। लोभी व्यक्ति का चारित्रिक पतन हो जाता है।

लोभ राजनीति का हो, किसी ऊंचे पद का हो, अर्थ प्राप्ति का हो, वासना के वेग का हो, यश प्राप्ति का हो या किसी भी प्रकार से किसी से कुछ पाने की लालसा का हो, ठीक नहीं है। लोभ एक क्षणिक प्यास की तरह है, जिसकी पूर्ति के लिए मनुष्य अनैतिक बन जाता है और गलत-काम करने लगता है, और आत्म कल्याण के पथ से भटक जाता है ।

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