राजनांदगांव 19 जुलाई। प्रख्यात जैन संत एवं मुनि विनय कुशल जी के सुशिष्य मुनि वीरभद्र (विराग ) जी ने कहा कि हम बातें तो 100 साल की करते हैं किंतु हमें कल की खबर नहीं होती। अपना अंपायर अपना बेटा तो भोग सकता है किंतु परिस्थितियां अनुकूल होनी चाहिए। अपना तो अपना होता है वह कहीं नहीं जाता, वह घूम फिर कर हमारे पास आ ही जाता है।
मुनि श्री वीरभद्र(विराग) जी ने जैन बगीचा स्थित उपाश्रय भवन में अपने नियमित प्रवचन के दौरान कहा कि आप खिला रहे हो इसका महत्व नहीं होता परंतु आप किस भाव से खिला रहे हो इसका महत्व अवश्य रहता है। सधार्मिक भक्ति वह होती है जो आंतरिक भाव से किया जाए।
उन्होंने कहा कि आजकल सधार्मिक भक्ति का रूप शक्ति ने ले लिया है। मुनि श्री ने उदाहरण देते हुए बताया कि हमने कैटर्स को खाना बनाने का ऑर्डर दे दिया और उसने खाना बना दिया किंतु उसमें वह भाव नहीं है जो खाना खिलाने की हमारे मन में है।
जैन मुनि ने आगे कहा कि हम खर्च करें, पहले परिवार के लिए फिर कमजोर रिश्तेदार के लिए और फिर जरूरतमंद के लिए। हर परिवार यदि एक कमजोर परिवार को गोद ले ले तो यह सम्यक दर्शन होगा, लेकिन यह तभी सम्यक दर्शन कहलायेगा जब हम उस परिवार को अपने परिवार की तरह ही ट्रीट करें।
यदि हम ऐसा उत्कृष्ट भाव से करते हैं तो भविष्य में हम इतिहास कल्याणक हो जाएंगे। हमें उस परिवार को यह भी एहसास कराना होगा कि भाई आपके जीवन में तकलीफ आयी ही क्यों, कहीं ना कहीं आपने धर्म से विरत कार्य किया है, इसलिए धर्म करें। यदि धर्म करोगे तो आने वाला जीवन धन्य हो जाएगा।
मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि कर्म साथ में नहीं होता तो विपरीत परिस्थितियां निर्मित होती है। उन्होंने आगे यह भी कहा कि व्यक्ति की पहचान विपरीत परिस्थितियों में ही होती है।
उन्होंने कहा कि यदि जीवन में सम्यक दर्शन आ जाए तो निमित्त और कार्य के बीच में फर्क नजर आ जाएगा। मन में अगर किसी के लिए दुर्भाव बनता है तो यह हमारे लिए उपयुक्त नहीं है। मन में इच्छा जाग जाए तो सारे मार्ग मिल जाते हैं।
उन्होंने कहा कि हम किसी के “कर्ता ” नहीं बन सकते तो क्या “निमित्त” तो बन सकते हैं। उन्होंने आत्मा को “निमित्त” बनाकर आत्म कल्याण मार्ग में बढ़ने के लिए बड़ी संख्या में उपस्थित लोगों से कहा।

