रायपुर (अमर छत्तीसगढ) 26 जुलाई। शासन दिपिका साध्वी मंजुला श्री जी आत्म जागृति पर वर्षावास में धर्म सभा में निरंतर अरिहंत परमात्मा की जिनवाणी पर प्रकाश डाल रही है। धर्म सभा में संबोधित करते हुए कहा-
हे भव्य उपासकों- परमात्मा महावीर के युग के प्रथम आचार्य सुधर्मा स्वामी ने अपने गुरु के प्रति “वीर स्तुती” प्रस्तुत कर उनका गुणगान किया गुणगान करते हुए बताया है- श्रमण, ब्राम्हण, क्षत्रियादि, गृहस्थ और शाक्य अन्य लोगों ने पूछा वे कौन महावीर है जिन्होने एकान्त रूप से आचरण योग्य हितकर श्रुत चारित्र रूप अनुपम श्रेष्ठ धर्म का कथन सम्यक रूपेण किया।
इस पर साध्वी जी निरंतर आचार्य सुधर्मा स्वामी उनके 81वें पहघर आचार्य नानालाल जी म.सा. के उदयपुर चार्तुमास के समय छत्तीसगढ़ में रही साध्वी शासन दिपिका ताराकंवर जी म.सा. के जीवन पर प्रकाश डाला।
हे भव्य उपासकों- सच्चे गुरू वह होते है जो आत्म कल्याण कराकर आत्मा से परमात्मा बनाने में लगा देते है। साध्वी ताराकंवरजी म.सा. ने गुरू-शरण में तेले का तप किया। उसके बाद उनके पारने का मन बना। वहां पर उस समय युवाचार्य श्री रामलाल जी म.सा. का पधारना हुआ। आपने छ.ग. में परमात्मा महावीर और गुरू की खूब धर्म प्रभावना की है।
आगे बढ़ो। इधर परमब्रद्धेय आचार्य नानालाल जी म. सा. भी पधार रहे थे उन्हे साध्वी सुविजेता श्री जी म.सा. (प्राणी वासला विजीया देवी सुराना) ने देखा और शीघ्र ताराकंवर जी को कहा गुरूदेव पधार रहे है। नाना गुरू ने कहा ताराजी तपस्या में आगे बढ़ो उन्होने गुरू वचन को अमृत वचन मानकर 36 की तपस्या कर ली।
हे भव्य उपासकों- गुरू के वचन सिद्धी होते है अमृत वचन होते है। जो गुरू आत्मा को कल्याण करने में लगाते है वे ही परमगुरू होते है। ऐसे गुरू की जो वाणी होती है हमारी आत्मा का कल्याण करने वाली होती है। गुरू ने ताराजी से कहा और 36 की तपस्या का तप हो गया। ऐसा अनेक कार्य गुरू वचनों से हो जाता है। सच्चे
गुरू ही मोक्ष मार्ग दिखाते है। वे कभी भी संसार में भटकने नहीं देते। वे मुक्ति की सही मंजिल दिशा बता देते है।
हे भव्य उपासकों- साधु-साध्वी कभी भी आहार-पानी लेने आवे उन्हें शुद्ध गोचरी बहरावें। उनके कल्प मर्यादा के अनुसार सभा में नागश्री के भोजन में बनी सब्जी पर प्रकाश डालते हुए बताया ऐसा आहार कभी भी साधु-साध्वी को नहीं बहराना।
ज्ञानिजन कहते है इस छोटी सी भूल से कितना अनर्थ हो जाता है। हमेशा जागरूक होकर शुद्ध आहार बहराना चाहिए।
हे भव्य उपासकों- धन्नाशाली भद्र 4 मासा सौनया लेकर पशुशाला में पहुंचा उनकी नजर एक बकरा पर पड़ी वह उसे खरीद लिया। उधर तीनो भाई धन्ना के पीछे लगकर यह सब देख रहे है।
धन्ना बकरा ले चल पड़ा रास्ते में देखा राजकुमार और लोग वहां पर दो बकरों को लड़ाने में शर्त लगा रहे थे जो जितेगा उसे एक लाख देना होगा। राजकुमार एक लाख रूपया हार गया। धन्ना ने सोचा ये हमारे यहां के राजकुमार है इनका हारना बहुत बड़ा अपमान है।
धन्ना ने राजकुमार से कहा मेरा बकरा लो और फिर से दोनो को लड़ाओ जो जितेगा उसे दो लाख मिलेंगे। राजकुमार ने शर्त मान ली और धन्ना से बकरा ले दोनो में युद्ध कराया और राजकुमार जीत गया। राजकुमार खुश हो गये। धन्ना की आगे बाते जानेंगे।

