रायपुर (अमर छत्तीसगढ) 28 जुलाई। शासन दिपिका साध्वी मंजुला श्री जी आत्म जागृति पर वर्षावास चार्तुमास के अवसर पर धर्म सभा में कहा हे भव्य उपासकों सर्वज्ञ सर्वदर्शी अरिहंत महावीर के जीवन पर प्रकाश डालते हुए प्रथम आचार्य श्री सुधर्मा स्वामी बता रहे है- उनका वस्तु के विशेष धर्मो को जानने का बोध ज्ञान कैसा था, सामान्य धर्मो को जानने वाला उपयोग दर्शन कैसा था, उनका यम नियम रूपशील कैसा था।
इन सब बातों पर साध्वी मंजुला श्री जी ने कहा- भगवान महावीर कर्मों के फल स्वरूप होने एवं चर्तुगति संसार परिभ्रमण के दुःखो को जानने वाले थे तथा वे कर्मों को हटाने निवारण के महान उपदेशक थे। उनके श्रुत एवं चारित्र धर्म को जानो और उनकी धैर्यता को भी देखो, समझो, जानो।
हे भव्य उपासकों- आप परमात्मा महावीर की जिनवाणी सुन रहे हो उसे सुनकर ज्ञान-क्रिया आप जब सामायिक करने बैठते हो तो पूरी वेशभूषा (चोला, दुपट्टा, आसन, पूंजनी) आदि धार्मिक उपकरण सहित लेकर बैठते हो और फिर धार्मिक क्रिया करते हो तो अपार खुशी होती है वैसे ही जैसा बच्चे को स्कूल भेजते है तो उसे ड्रेस, मोजा, जूते, पढ़ाई आदि के उपकरण सहित तो वह वहां के वातावरण से वहां के अनुशासन में ढल जाता है।
ठीक इसी प्रकार सामायिक में हम भी परमात्मा की जिनवाणी सुन जीवन को अनुशासन के साथ मर्यादित बना देते है। परमात्मा के आदर्शों से जुड़ते चले जाते है।
हे भव्य उपासकों- राजकुमार जीतने के बाद धन्ना को 2 लाख रूपये देकर गले लगा लिया दोनो मित्र बन गये। धन्ना ने राजकुमार से कहा आप ये शर्त और जुआ न खेले आप नगर के राजा हो आप को देखकर नगर मे ये प्रथा चलेगी तो पूरा नगर अशांत और बर्बाद हो जाएगा। यह बात राजकुमार को पसंद आई और उसने जुआ और कुव्यसन आदि का त्याग कर दिया दोनो घनिष्ठ मित्र बन गये।
धन्ना ने पिता श्री से कहा- आपके आर्शीवाद से ये दो लाख की कमाई आई है पिता ने कहा बेटा इससे गांव वालो को भोजन कराकर बचे रूपयो से तीनो भाई व परिवार के लिये आभूषण, कपड़े आदि खरीद कर दे दिये। सभी प्रसन्न थे। इधन तीनो भाई धन्ना की कमाई से चिढ़े हुए थे आगे क्या वे करते है वह आगे समय पर बताया जायेगा।
अशोक सुराना ने बताया मंजुला श्री जी के दर्शनार्थ, दुर्ग, डौंडीलौहारा, धमधा, धमतरी, छुईखदान, डोंगरगांव आदि अनेक क्षेत्र से धर्मप्रेमी बन्धु आए उन्होने प्रवचन दर्शन का भी लाभ लिया।

