राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ) 3 अगस्त। “अपने भीतर गुणों का विकास करो तभी आप लोगों के लिए आदर्श बन पाएंगे। इतिहास में भीष्म पितामह जैसे उत्तम पात्र हुए, उसका एकमात्र श्रेय गंगा माता को जाता है जिन्होंने उन्हें संस्कार दिया। भीष्म पितामह ने पूरा जीवन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया। ” उक्त उदगार जैन संत वीरभद्र (विराग) मुनि ने व्यक्त किये।
जैन बगीचे के नए हाल में आज मुनि श्री ने अपने प्रवचन में कहा कि जितने भी महापुरुष हुए हैं, उनके संस्कारवान होने के पीछे उनकी माताओं की विशेष भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में मन की स्थिति कुछ और होती है और बाहर की कुछ और।
हमारे अंदर गुणों का विकास हो जाएं तो हम भी आदर्श बन जाएंगे। अंदर सम्यक दर्शन की प्राप्ति करें। वर्तमान में प्रवृत्तियां भले ही अच्छी रहे किंतु परिस्थितियां अनुकूल नहीं है। हमें परिस्थितियों को अनुकूल बनाकर चलना होगा।
मुनि श्री वीरभद्र( विराग) जी ने कहा कि दुनिया स्वार्थियों से भरी पड़ी है। सभी अपने स्वार्थ साधने के लिए लगे हुए हैं, इसलिए कोई किसी के आत्म कल्याण में सहायक नहीं बनता।
उस परम सत्ता से जुड़ने की लोगों की इच्छा ही नहीं होती। यह जीव जहां उसका विरोधी पक्ष है, उस ओर अपना ध्यान केंद्रित कर देता है। वह उसकी कमी ढूंढने में लग जाता है। वह आत्म कल्याण का मार्ग छोड़ देता है और फिर उसकी भटकन शुरू हो जाती है। मुनि श्री ने कहा कि आत्म कल्याण की राह कभी ना छोड़े।
मुनि श्री वीरभद्र( विराग) जी ने कहा कि कोई भी वस्तु पहले खराब नहीं होती, धीरे-धीरे उसमें खराबी आती है। उस वस्तु के खराब होने से पहले उसका उपयोग कर लें,ठीक इसी तरह आत्मा को भटकने से पहले ही उसे कल्याण मार्ग से जोड़ दें तो वह कभी भटकेगी नहीं।
आप अपने बारे में अपने घर के लोगों की राय पहले लें। यही आपकी अपनी पहचान है। मुनि श्री ने कहा कि आप अपने भीतर गुण पैदा करें और लोगों का आदर्श बनते हुए आत्म कल्याण की राह में आगे बढ़ें।

