कविता- वक्त मुझे लौटा दे ए ज़िंदगी… (विभोर बाफना)

कविता- वक्त मुझे लौटा दे ए ज़िंदगी… (विभोर बाफना)

वो वक्त मुझे लौटा दे ए ज़िंदगी…

वो बचपन लौटा दे मुझे ए ज़िंदगी,
मुझे बचपन का वो समय कमाल चाहिए,
न किसी बात का जवाब देना है,
न जिंदगी के सवाल चाहिए।

मुझे बचपन का वो यार चाहिए,
जो साथ था हर पल, वो दिलदार चाहिए,
नफ़रतों की दीवारों से परे,
जहां बस हो हंसी और वो मज़ाक बेशुमार चाहिए।

माँ की ममता, पापा की डांट चाहिए,
वो स्कूल की घंटी, वो छुट्टी की बात चाहिए,
अब सब है पर वो सुकून नहीं,
जो तब था अब वो जुनून चाहिए।

वो बचपन की मस्तियां वो खेल खिलौने,
मुझे मेरे बचपन के हथियार चाहिए,
जब न थी कोई कसक,
मुझे वो बचपन मेरा यादगार चाहिए।

हँसी जो छलकती थी आँखों से,
बिना वजह, बिना शर्त, बेहिसाब चाहिए,
मिट्टी की खुशबू, बारिश की बूँदें,
और वो पुरानी यादों का कारवां चाहिए।

वो खेल-खेल में किए वादे,
उस उम्र की बेफिक्री का खुमार चाहिए,
वो मासूमियत, वो मुस्कुराते चेहरे,
बस मुझे वो सपने साकार चाहिए।

अब भी दिल की खामोशी में कहीं,
मुझे बचपन का वो किरदार चाहिए,
जो लौटाए बचपन की मासूमियत,
और हर पल को फिर से पुकार चाहिए।

मुसाफिर आज भी पलटता है ज़िंदगी के पन्ने ,
जहां रंग थे, सपने थे और थे अपने,
अगर तू दे सकती है तो बस इतना ही दे,
वो मासूम सा कल – मुझे मेरे बचपन का त्यौहार चाहिए।

— 🖋️ मुसाफिर ( विभोर बाफना)

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