शोमनमुनि पर्युषण पर्व के छठ्ठ दिवस पर अन्तगडदसाओ के छड़े वर्ग का वांचन

शोमनमुनि पर्युषण पर्व के छठ्ठ दिवस पर अन्तगडदसाओ के छड़े वर्ग का वांचन

देशनोक (अमर छत्तीसगढ) 25 अगस्त।

शारान दीपक शोमनमुनि पर्युषण पर्व के छठ्ठ दिवस पर अन्तगडदसाओ के छड़े वर्ग का वांचन कर धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए कहा- अरिहंत महावीर भगवान ने इस वर्ग में सोलह अध्ययन फरमाए है उस काल उस समय में राजगृह नामक नगर था। श्रेणिक राजा वहां राज्य करते थे।

वहां अरिहंत भगवान महावीर स्वामी ग्रामानुग्राम विचरण करते हुए गुणशील उद्यान में पधारे। उस संयम मंकाई गाथापति भगवान महावीर को देशना सुनी और दीक्षा लेकर सिद्ध. बुद्ध गति को प्राप्त हुए।

राजगृह नगर में अर्जुन नाम का माली निवास करता था। उसकी बन्धुमती नाम की पत्नी थी। वहां पर मुदगरपाणि यक्ष का एक यक्षायतन था। वह उसका भक्त था। वह बगीचों से फूलों को लेकर बेचता आजीविका चलाता था।

उस राजगृह नगर में ललिता नामक गोष्ठी (स्वेच्छा चारी) मित्रों का समुदाय रहता था। उनकी नजर अर्जुनमाली की पत्नी पर पड़ती है और प्लान बनाते है, अर्जुनमाली को अवकोटक बंधन में बांधकर रख देते है। फिर बन्धुमती मालिनी के साथ वे लोग विपुल भोगों को भोगकर विचरण करते रहते हैं।

अर्जुनमाली मुद्गरपाणि यक्ष के पास पहुंचता है और अपनी याचना रखता है। और वह बंधन मुक्त हो जाता है। मुदगरपाणि यक्ष अर्जुनमाली के शरीर में प्रवेश करता है और अर्जुनमाली लगभग साढ़े बासठ सेर वजन के लोहे से बने मुद्गर को लेता है और छह पुरुषों और सातवी अपनी पत्नी को मार देता है। इस प्रकार वह रोज छह पुरुष और एक स्त्री को मौत के घाट उतारता हुआ घुमने लगा।

राजा श्रेणिक को यह जानकारी होने पर नगर में इसकी जानकारी देकर घोषणा कर दी कोई बाहर न निकले। भगवान महावीर का गुणशील उद्यान में पधारना हुआ। सुदर्शन श्रगणोपासक को जानकारी मिली की भगवान महावीर पधारे है वह माता-पिता से आज्ञा गांगी उन्होंने कहा राजा श्रेणिक ने बाहर जाने की मनाही लगा रखी है, पर माता-पिता को समझाकर आज्ञा लेकर वह पैदल निकलता है। राजगृह नगर के बीच पर पहुंचता है, उसे

मुद्गरपाणि यश (अर्जुनमाली) देखता है और दांत पीसते हुए उस नारी लोहे के मुद्गर को आकाश में घुमाते घुमाते सेठ सुदर्शन की तरफ बढ़ता है। सेठ सुदर्शन शांति से यह सब देखता रहा, बिना डरे भूमि को पूंजकर वहां बैठकर सिद्ध गति प्राप्त अरिहंत भगवान को वंदन नमन करते है। वहां विराजित भगवान महावीर को वंदन करते है और ध्यान में लग जाते है।

इधर मुद्गरपाणि यक्ष (अर्जुनमाली) पर प्रहार करता है लेकिन वह एक हजार पल के भारी बने लोहे का मुद्गर जिस दिशा से आया था उसी दिशा में लौट जाता है।

जब अर्जुनमाली जमीन पर सुदर्शन सेठ के पास अपने का वहां गिरा पाया और वह कहने लगा आप कौन है, कहां जा रहे हो? तब सुदर्शन सेठ ने कहा मैं भगवान महावीर के दर्शन करने जा रहा हूं। अर्जुनमाली ने कहा मैं भी साथ चलता हूं।

दोनों वहां भगवान महावीर को वंदना की और धर्म का उपदेश सुना। अर्जुनगाली ने भगवान महावीर से कहा मैं इस निग्रन्थ प्रवचन पर श्रद्धा रखता हूं और दीक्षा लेना चाहता हूं उस ने दीक्षा ग्रहण कर ली। बेले बेले का तप कर आहार पानी लेने वे नगर में जाते।

नगर में लोग कहते ये वही है जो मेरे पिता, भाई-बहन पत्नी, पुत्री आदि को मारा। वे लोग पत्थर आदि फेंकते तब अर्जुनमाली मन में द्वेष नहीं लाया और समभावों से उसे सहन किया फिर भगवान महावीर के पास आकर आज्ञा लेकर अर्धमास संलेखना (संथारा) लेकर सिद्ध गति प्राप्त कर लिया। क्रमशः

अशोक सुराणा ने जानकारी देते हुए बताया की इस पर्युषण पर्व में देशनोक में इस पर्व को हर्षोल्लास के साथ उपवास, बेला, तेला, अठाई, ग्यारह, पंन्द्रह, तीस और तीस से अधिक की तपस्याएं चल रही है, साथ ही दया, पौषण, आयम्बिल सवर आदि के अनेक तप हो रहे हैं। धन्य है देशनोक नगरी जहां पर जमीकंद का त्याग एवं छोटे से छोटे जीवों को अभ्यदान श्रावक श्रविका दे रहे है और प्रतीक्रमण करके सभी जीवों से क्षमायाचना कर रहे है।

आज धर्म सभा में शासन दीपक राममूर्तिश्रीजी- रामइदेशश्रीजी एवं साध्वी खंदीतप्रभाजी, साध्वी तृप्तीश्रीजी, साध्वी माधुरीश्रीजी ने भी धर्म सभा को सम्बोधित किया। धर्म सभा का संचालन शासन दीपक मधुरमुनिजी म.सा. ने किया।

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