मन में संतोष नहीं तब तकप्रसन्नता नहीं- मुनि वीरभद्र

मन में संतोष नहीं तब तकप्रसन्नता नहीं- मुनि वीरभद्र


राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ) 15 सितंबर।श्री विनय कुशल मुनि के सुशिष्य एवं 171 दिन तक उपवास का रिकॉर्ड बनाने वाले जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि जब तक मन में संतोष नहीं तब तक प्रसन्नता नहीं आएगी, जीवन में कोई मजा नहीं आएगा।

उन्होंने कहा कि लाखों-करोड़ों रुपए होने को बावजूद धन कुबेरों के चेहरे में प्रसन्नता नहीं दिखती, वे हमेशा चिंतित नजर आते हैं। मजदूर शाम के 6:00 बजे तक मजदूरी कर निश्चित हो जाते हैं और उनके चेहरे पर संतोष जनक भाव नजर आते हैं। उन्होंने कहा कि संतोष सबसे बड़ी चीज है।


जैन बगीचे के उपाश्रय भवन में मुनि श्री वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि आत्मा जिस दिन अपने दोषों-अवगुणों को पहचान जाएगी, उस दिन आत्मा परमात्मा बन जाएगी। हमें भी आत्मा को आगे बढ़ाना है तो इसके दोषों-अवगुणों को दूर करना होगा। उन्होंने कहा कि जिन्होंने अपनी गलतियों को पहचाना वे आगे बढ़ गए और जिन्होंने अपनी गलतियों को नहीं पहचाना वे वहीं के वहीं रह गए। सारी साधना -आराधना ही इसलिए है।


मुनि श्री वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि आशाएं-अपेक्षाएं ही दुख का मूल कारण है। उन्होंने कहा कि जिसके पास सबकुछ है,वह और पाने की इच्छा रखता है तो वह दुखी है। जिसे कुछ नहीं और उसे कुछ भी नहीं चाहिए तो वह राजाओं का राजा है।लौकिक इच्छा तो सभी की है किंतु लोकोत्तर मोक्ष पाने जैसी इच्छा किसी में नहीं है।

उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक दृष्टि से हर पल जागते रहना होगा। मुनि श्री ने कहा कि हमारी आत्मा को ताकतवर बनाने के लिए हमें सजग रहकर ध्यान करना होगा और भीतर के दोषों-अवगुणों को बाहर निकालना होगा। यह जानकारी एक विज्ञप्ति में विमल हाजरा ने दी।

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