कांच देखेंगे तो कंपैरिजन की भावना पैदा होगी ही, यही भव है जहां हम मोक्ष के लिए आराधना कर सकते हैं- मुनि वीरभद्र

कांच देखेंगे तो कंपैरिजन की भावना पैदा होगी ही, यही भव है जहां हम मोक्ष के लिए आराधना कर सकते हैं- मुनि वीरभद्र

राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ) 03 अक्टूबर। प्रख्यात जैन संत श्री विनय कुशल मुनि के सुशिष्य एवं 171 दिन तक उपवास का रिकॉर्ड बनाने वाले जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि यही भव है जहां हम मोक्ष के लिए आराधना कर सकते हैं अन्य भव में संभव नहीं, चाहे वह देवभव ही क्यों ना हो और साधुपन बिना मोक्ष संभव नहीं है।

भले ही भाव से साधुपन हो। उन्होंने कहा कि अन्याय, अनिति कर अपने मोक्ष के लक्ष्य को कठिन मत बनाओ। उन्होंने कहा कि नवकार मंत्र “ओम नमो अरिहंतानम” का मतलब ही यह होता है है कि मुझे अरिहंत की आज्ञा स्वीकार है और मुझे अरिहंत की आज्ञा का पालन करना है।


जैन बगीचा स्थित उपाश्रय भवन में मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि यही वह भव है जहां हम मोक्ष की आराधना कर सकते हैं अन्य भव में नहीं। इसी भव में हम पुरुषार्थ कर सकते हैं।

आज तो मोक्ष का लक्ष्य आराधना से गायब हो गया है। कर्म सत्ता ने हमको उलझाकर रख दिया है। हम दूसरों के रोल में इंटर करके उलझ जाते हैं। जबकि हमें अपना रोल निभाना चाहिए।

हम एक दूसरे से कंपैरिजन में लग जाते हैं जिसकी वजह से हम दुखी हैं। साधु इन सब से दूर रहते हैं। कांच देखेंगे तो कंपैरिजन की भावना पैदा होगी ही! अपना कंपैरिजन बाहर की चीजों से होता है अंदर की चीजों से नहीं।


मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि दुनिया में थोड़े-थोड़े टाइम में डिजाइन बदलती रहती है। एक चीज का निर्माण हुआ तो दूसरी चीज बन जाती है। मनुष्य जीवन इससे प्रभावित होता है।

इससे विपरीत साधु जीवन आराधना में व्यतीत होता है। वह पूरी तरह से स्वाधीन होता है। यहां तक कि वो पारिवारिक बंधनों से भी दूर होता है। जितना कंपैरिजन होता है व्यक्ति उतना ही दुखी होता है। किसी भी वस्तु का साधु भोग नहीं उपयोग करता है जबकि मनुष्य भोग करता है।

साधु की एक विशिष्ट शक्ति होती है और वह है उसकी सहनशक्ति। उन्होंने कहा कि साधु जीवन में धर्म के कार्य अच्छी तरह से होते हैं। उन्होंने कहा कि नवकार मंत्र का जाप करते हुए आत्म कल्याण मार्ग में बढ़ जाओ। यह जानकारी मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने दी।

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