बिलासपुर(अमर छत्तीसगढ) 2 नवंबर। श्री 1008 आदिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर क्रांतिनगर बिलासपुर में श्री 1008 सिद्धचक्र महामंडल विधान का आयोजन बड़े ही भक्ति और उत्साह के साथ चल रहा है। प्रातः 6:30 बजे से श्रद्धालुओं का मंदिर जी में आना प्रारंभ हो जाता है, सर्वप्रथम मंगलाष्टक, अभिषेक इसके बाद शांतिधारा और पूजन की जाती है।
बिलासपुर जैन सभा के संरक्षक एवं इस विधान के आयोजक व पुण्यार्जक श्रीमंत सेठ प्रवीण जैन ने बताया कि पूजन के बाद सिद्धचक्र महामंडल विधान का पाठ प्रारंभ होता है और इंद-इंद्राणी, मुख्य पात्र मण्डल एवं श्रद्धालुगण मण्डल पर जाकर श्रीफल के साथ अर्घ्य समर्पित करते हैं।
संध्याकालीन बेला में श्रीजी की आरती एवं भजन किया जाता है। इसके बाद विधानाचार्य बाल ब्रह्मचारी मनोज भैया द्वारा शास्त्र प्रवचन किए जाता है। प्रवीण जी ने बताया कि विद्वानों ने इस विधान को लघु समयसार कहा है।
दिगम्बर जैन श्रमण संस्कृति की महान परंपरा के अनुसार अष्टान्हिका पर्व में पंच-परमेष्ठी की पूजा,आराधना करने का एक विशेष महत्व होता है, इसलिए अष्ठानिका महापर्व के पावन पुनीत अवसर पर श्री 1008 सिद्धचक्र महामंडल विधान का आयोजन हमेशा से किया जाता रहा है।

विश्व शांति की मंगल कामना से आयोजित इस अनुष्ठान में सकल जैन समाज बिलासपुर के सैकड़ों श्रावकों के साथ साथ अन्य समाज के गणमान्य नागरिक भी शामिल हो रहे हैं।
इस ऐतिहासिक अनुष्ठान में आज भगवान की शांतिधारा करने का सौभाग्य श्रीमंत सेठ प्रवीण जैन, आकाश जैन इंदौर, उत्तम चंद जी जैन, निर्मल जैन, अमित जैन, प्रदीप जैन, महेंद्र जैन, राकेश जैन मुंगेली, सवाई सिंघई देवेंद्र जैन, विशाल जैन, राजेश जैन और सुरेंद्र जैन परिवार को मिला।
विश्व शांति एवं सभी की मंगल कामना के साथ प्रारम्भ हुए इस अनुष्ठान के चौथे दिन मंत्रोच्चार के साथ 64 अर्घ चढ़ाए गए, विधानाचार्य मनोज भैया द्वारा पूजा में चढ़ाए गए अर्घ्यों का अर्थ विस्तार पूर्वक बताया गया। विधान के दौरान विधानाचार्य जी ने बताया कि कर्म मूलतः आठ होते हैं, जिनके कारण संसारी जीव सत्कर्म और असत्यकर्म करता है।
सत्कर्म से अच्छी भोग सामग्री प्राप्त होती है और दुष्कर्म करने से शरीर रोगग्रस्त, संतान आचरणहीन और परिवार में झगड़े होते हैं, कुल मिलाकर अशुभ चीज़ों की प्राप्ति होती है। उन्होंने इस अनुष्ठान की महिमा बताते हुए कहा कि भगवान के दरबार में जो भी सिद्ध चक्र महामण्डल विधान को श्रद्धा भक्ति के साथ आयोजित करता है वह सदैव सुख सम्पत्ति और वैभव को प्राप्त करता है।
उन्होंने कहा कि जैन अनुष्ठानों में इस विधान का स्थान सर्वोपरि है। इस अनुष्ठान को करने वाला, कराने वाला या रंच मात्र भी सहयोग करने वालों को ऐसा पुण्य लाभ होता है जो कभी कम अथवा नष्ट नहीं होता।
विधानाचार्य जी ने कहा कि जैन धर्म समेत लगभग सभी धर्मों में चक्र का विशेष महत्व है। यह धर्म चक्र तीर्थंकरों के आगे-आगे चलता है, इसलिए अंतरात्मा के साथ श्रद्धापूर्वक पूजा करने से अलौकिक पुण्य को प्राप्त कर अपने जीवन को धन्य बना सकते हैं।
विश्व शांति की मंगल कामना से आयोजित इस अनुष्ठान में शामिल होने वाले शहर के गणमान्य नागरिकों में से आज बिलासपुर के जिलाधीश संजय अग्रवाल एवं वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रजनेश सिंह सम्मिलित हुए।
पुलिस अधीक्षक सिंह ने कहा कि इस पवित्र अनुष्ठान के क्षेत्र में आते ही एक अलग ही प्रकार की सकारात्मक ऊर्जा का संचार पूरे शरीर में होने लगा है, जब कुछ ही समय में मुझे इतनी ऊर्जा मिल रही है तो आप लोग जो पूरे नौ दिन इस अनुष्ठान का हिस्सा हैं तो आप लोगों को कितनी ऊर्जा मिलेगी।
जिलाधीश संजय अग्रवाल ने कहा कि सभी को पता है कि जैन संत कितनी कठोर तपस्या करते हैं एवं जैन श्रावक भी बहुत नियमों का पालन करते हैं। आप सभी के इस तप एवं अनुष्ठान से पूरे बिलासपुर शहर में शांति कायम रहेगी एवं हमारा शहर उत्तरोत्तर प्रगति करता रहेगा। इन विशिष्ट अतिथियों ने इस अनुष्ठान के सफल आयोजन की कामना की एवं समस्त जैन समाज के पुण्य की अनुमोदना की।
सांध्यकालीन आरती एवं प्रवचन उपरांत आयोजित धार्मिक कार्यक्रमों की श्रृंखला में डॉ. सुप्रीत श्रुति जैन द्वारा निर्देशित ऐतिहासिक नाटिका की प्रस्तुति की गई जो जैन समाज की वीरांगना रानी अबक्का पर आधारित थी। रानी अबक्का भारत के दक्षिण-पश्चिम तट के इतिहास में एक अद्भुत, वीरांगना, देशभक्त और स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणास्रोत रानी थीं।
उन्हें भारतीय इतिहास की पहली महिला नौसैनिक योद्धा भी कहा जाता है। वे सोलहवीं शताब्दी में कर्नाटक के तटीय क्षेत्र उल्लाल की शासनकर्ता रानी थीं।
इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि पुर्तग़ालियों ने भारत में मसाला व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करने के लिए तटीय राजाओं को दबाना शुरू किया। रानी अबक्का ने उनके कर और नियंत्रण के प्रस्ताव को सख़्ती से ठुकरा दिया।
उन्होंने नौसेना, स्थानीय योद्धाओं, मुस्लिम-हिंदू मिलिशिया और तटवर्ती मछुआरों की सेना बनाकर पुर्तग़ालियों को कई बार पराजित किया, इसलिए वे पुर्तग़ालियों के खिलाफ लगातार विजय प्राप्त करने वाली एकमात्र भारतीय महिला शासक मानी जाती हैं।
उन्हें “अभया रानी” (निडर रानी) कहा जाने लगा। इसके साथ ही उन्हें “भारतीय इतिहास की पहली स्वतंत्रता संग्राम सेनानी”, “समुद्री शिवाजी” और “कन्नड की झांसी” भी कहा जाता है। उनकी स्मृति में कर्नाटक में हर वर्ष रानी अबक्का उत्सव मनाया जाता है।
इसके साथ ही भारतीय तटरक्षक बल ने 1997 में आईसीजीएस अबक्का नामक पोत को शामिल किया और 2003 में डाक विभाग ने उनके नाम पर एक विशेष कवर भी जारी किया है। भारत की इस जैन वीरांगना का नाम भले ही इतिहास के पन्नों में दब कर रह गया हो, मगर उनका व्यक्तित्व आज भी प्रेरणा देता है।

