श्री 1008 सिद्धचक्र महामंडल विधान के सातवें दिन….. अरिहंत परमेष्ठी, सिद्ध परमेष्ठी, आचार्य परमेष्ठी, उपाध्याय परमेष्ठी एवं साधु परमेष्ठी प्रत्येक के सौ-सौ अर्ध के साथ कुल 512 अर्ध चढ़ाये गए

श्री 1008 सिद्धचक्र महामंडल विधान के सातवें दिन….. अरिहंत परमेष्ठी, सिद्ध परमेष्ठी, आचार्य परमेष्ठी, उपाध्याय परमेष्ठी एवं साधु परमेष्ठी प्रत्येक के सौ-सौ अर्ध के साथ कुल 512 अर्ध चढ़ाये गए

बिलासपुर(अमर छत्तीसगढ) 5 नवंबर। विश्व शांति और सर्वकल्याण की मंगल भावना से श्री 1008 आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, क्रांतिनगर बिलासपुर में आयोजित हो रहे श्री 1008 सिद्धचक्र महामंडल विधान के सातवें दिन अरिहंत परमेष्ठी, सिद्ध परमेष्ठी, आचार्य परमेष्ठी, उपाध्याय परमेष्ठी एवं साधु परमेष्ठी प्रत्येक के सौ-सौ अर्ध के साथ कुल 512 अर्ध चढ़ाये गए।

ललितपुर से पधारे विधानाचार्य बाल ब्रह्मचारी मनोज भैया के सानिध्य, पंडित मधुर जैन के सहयोग एवं टीकमगढ़ के संगीतकार राकेश जैन एवं उनकी मण्डली के कारण समस्त बिलासपुर इस धार्मिक अनुष्ठान का आनंद लेते हुए धर्मलाभ ले रहे हैं।

इस अनुष्ठान में न केवल जैन समाज बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ एवं भारत के कई प्रदेशों से अन्य समाज के लोग भी इस अनुष्ठान में अपनी उपस्थिति देकर पुण्य लाभ ले रहे हैं।

विधानाचार्य मनोज भैया ने विधान के दौरान बताया कि जो व्यक्ति यह चिंतन करता है कि मेरी आत्मा के सिवाय संसार का रंचमात्र भी बाहरी पदार्थ मेरा नहीं है।

उन्होंने समझाते हुए कहा कि जिस प्रकार पहाड़ की चोटी पर पहुंचने के लिए हमें भार रहित होना या हल्का होना जरूरी होता है, उसी प्रकार सिद्धालय की पवित्र ऊंचाइयां पाने के लिए हमें एकदम खाली होना आवश्यक है। यह आत्मा, संकल्प, विकल्प रूप कर्तव्य भावों से संसार सागर में डूबती रहती है।

जिस प्रकार सांझ घिरते-घिरते सभी पक्षी एक तरुवर पर आकर विश्राम कर लेते हैं, किंतु सुबह होते ही अपने-अपने कार्य के लिए भिन्न-भिन्न दिशाओं में चले जाते हैं। ठीक इसी प्रकार संसार में हम सभी का निवास है। पुराने किसी संयोग की वजह से आप यहां एकत्रित हुए हैं किंतु आगे की यात्रा तो आपको एकाकी ही करनी है।

सांध्यकालीन समय में संगीतमय आरती ने सभी को मंत्र मुग्ध कर दिया। आरती के पश्चात पंडित मधुर भैया ने अपने प्रवचन में कहा कि संयम अक्षरों सम् और यम से मिलकर बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है सम्यक रूप से यम अर्थात् नियंत्रण करना संयम है।

हम कह सकते हैं जैसे बिना ब्रेक के गाड़ी बेकार है ठीक उसी प्रकार बिना संयम के अमूल्य आभूषण के बिना मनुष्य भव बेकार है, इसीलिए जैनागम में संयम का पालन मुनिराज और श्रावक दोनों के लिये वर्णित है।

उन्होंने कहा कि संयम वह पावन धर्म है, जिसके बिना जीवन रूपी मार्ग पर चलना संभव नहीं है। संयम वह निधि है, जो मनुष्य को पूज्य बना देती है। संयम ही मानव जीवन का सार है। जो अपनी इंद्रियों पर संयम रखना सीख जाता है, वह अहंकार पर विजय प्राप्त कर लेता है, लेकिन मनुष्य का इच्छाओं पर भी नियंत्रण नहीं है। प्रभु जितना देते हैं, मनुष्य की भूख बढ़ती जाती है और फिर मनुष्य गलत रास्ते को अपना लेता है। संयम को हम बंधन कहते है, लेकिन यह बंधन दुख नहीं, बल्कि सुख प्रदान करने वाला है। उन्होंने समझाया कि अपनी पांच इन्द्रियों के विषयों का सेवन हम सुख की कामना से करते हैं, पर विचार करें कि क्या हमें उनके सेवन से सुख मिलता है ? नहीं !! भ्रम से सुख का आभाष मात्र होता है, वो भी कुछ ही क्षणों के लिये। वास्तव में विषयों का सुख एक ऐसे फल के समान है, जो जीभ पर रखने पर तो मीठा लगता है, पर बाद में घोर दुख, महादाह, और संताप देता है, ठीक उसी प्रकार ये पंचेन्द्रिय के विषय जीव को बहुत आकर्षित करते है, लुभावने और मनमोहक लगते हैं, पर इनके फल में जीव अनंतकाल तक नरकों के घोर दुखों को सहन करता है। उन्होंने समझते हुए कहा कि चारों गतियों में से एक मात्र मनुष्य गति के जीव ही संयम पाल सकते हैं। हम अपने कुछ स्वार्थों को पूरा करने के लिये न जाने कितने जीवों की हिंसा प्रतिदिन करते हैं, जैसे अभक्ष्य भक्षण, रात्रि भोजन, सौन्दर्य के सामान आदि के लिये हम अनंत जीवों की हिंसा करते हैं। यदि हम चाहे तो इन इच्छाओं पर नियंत्रण करके आंशिक रूप से ही सही जीव दया का पालन कर संयम की रक्षा कर सकते हैं, जो एक सच्चे श्रावक को करना ही चाहिये।

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