सोचने से आत्मा जाग्रत हो जाती है हम इतने ज्ञानी नही जो पचा सके- श्री श्रुतप्रभ जी

सोचने से आत्मा जाग्रत हो जाती है हम इतने ज्ञानी नही जो पचा सके- श्री श्रुतप्रभ जी

ब्यावर राजस्थान (अमर छत्तीसगढ़) 29 अप्रैल
आचार्य श्री रामेश के शिष्य शासन दीपक श्री श्रुतप्रभ जी म सा ने समता भवन मे प्रवचन देते हुए बताया की व्यक्ति की प्रशंसा इस बात की होती है कि वह क्या सोचता है?

सोचने से आत्मा जाग्रत हो जाती जिससे उसकी सोच सकारात्मक होती है उनकी आत्मा सदैव जाग्रत रहती है,वह अपने आप को समझता है।ध्यान चिंतन रोज बढाना है।


म सा ने कहा समायिक मे अंहकार नही होना चाहिए, साधु की क्रिया साधना के लिए होती है।सुबह एक घंटा ध्यान मे आत्मा को जाग्रत करने मे लगानी चाहिए. हमे तत्व ज्ञान व बतीस आगम को अब तक समझ नही पाये न पढ पाये।जितनी गर्मी सहन करेंगे उतने कर्म कटेंगे।
इससे पहले शासन दीपिका विध्यावती जी म सा ने कहा बुद्धि मान व्यक्ति अपने आप को होशियार समझता हे न खुद करता न करने देता,ज्यादा खुश होना ज्यादा दुखी होना कर्म बांधता है, अरमान बाहुबली जैसे होना चाहिए। काल का अनागम काल नही मृत्यु का अनागम काल नही किसी भी समय हो सकता।
म सा ने बताया भगवान की आज्ञा मे होता है वह पांचो इन्द्रियों को बस मे कर लेता है जो आज्ञा मे नही रहता वह भोगो मे व्यस्थ हो जाता है और गलियां निकालता रहता है।कमजोर व्यक्ति बढिया खा लेता है उसे विकार हो जाता है। हम इतना ज्ञानी नही जो पचा सके।
संघ प्रवक्ता
नोरतमल बाबेल
साधुमार्गी जैन संघ, ब्यावर।

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