भक्ति सम्मुलास चातु॔मास 2026 ब्यावर…. राष्ट्र में भ्रष्टाचार, विश्व में आतंकवाद का मुख्य कारण है, व्यसन – आचार्य श्री विजय राज जी

भक्ति सम्मुलास चातु॔मास 2026 ब्यावर…. राष्ट्र में भ्रष्टाचार, विश्व में आतंकवाद का मुख्य कारण है, व्यसन – आचार्य श्री विजय राज जी

ब्यावर राजस्थान (अमर छत्तीसगढ़) 11 सितंबर । नवकार भवन में चल रहे पर्युषण पर्व के तीसरे दिन गुरुवार को आयोजित धर्मसभा में आचार्य श्री विजय राज जी म सा ने “दुर्व्यसनों में अंधी दुनिया” विषय पर प्रवचन दिए। आचार्य श्री ने कहा कि क्षणिक सुख के लिए किया गया व्यसन दीर्घकालीन दुख और रोगों की ओर ले जाता है। स्थायी सुख त्याग से मिलता है, जबकि क्षणिक सुख भोग से प्राप्त होता है।

आचार्यश्री ने कहा कि किसी पदार्थ या गलत प्रवृत्ति का निरंतर सेवन धीरे-धीरे आदत बन जाता है। जब आदत निरंतर बढ़ती रहती है तो वह व्यसन का रूप ले लेती है। व्यसन व्यक्ति को अपनी गिरफ्त में लेकर उसकी स्वतंत्रता छीन लेता है। उन्होंने कहा कि केवल जैन कुल में जन्म लेने से कोई जैन नहीं बनता, बल्कि जैन धर्म के सिद्धांतों और आचरण को जीवन में उतारने वाला ही वास्तविक अर्थों में जैन है।

आचार्यश्री ने कहा कि व्यसन केवल व्यक्ति को ही नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि इसका प्रभाव परिवार, समाज और राष्ट्र तक पहुंचता है। यदि व्यक्ति व्यसनमुक्त हो जाए तो परिवार द्वेष मुक्त हो सकता है, समाज आडंबर से मुक्त हो सकता है, राष्ट्र भ्रष्टाचार से और विश्व आतंकवाद से मुक्त हो सकता है। आज देश भ्रष्टाचार और विश्व आतंकवाद जैसी समस्याओं से जूझ रहा है और व्यसन भी एक प्रमुख कारण है।

बुराई छोड़ने का संकल्प ही पहला कदम

आचार्यश्री ने दिल्ली में संतों के सानिध्य से जुड़ा प्रसंग सुनाते हुए कहा कि संतों का दरबार तीर्थ के समान होता है। व्यक्ति यदि संतों के समक्ष अपनी किसी बुराई का त्याग करने का संकल्प लेता है तो उसे आत्मबल मिलता है। उदाहरण देते हुए बताया कि एक व्यक्ति को बहुत गुस्सा आता था। गुरु ने उसे कहा कि जब भी गुस्सा आए, जिस व्यक्ति पर गुस्सा किया है, उसे 100 रुपये दान देना। पत्नी, बच्चे, नौकर या ड्राइवर किसी पर भी गुस्सा आए तो 100 रुपये देने होंगे। कुछ समय बाद पैसे जाने के भय से व्यक्ति ने गुस्सा करना छोड़ दिया।


इसी प्रकार झूठ बोलने, गाली देने और सिगरेट पीने जैसी आदतों से परेशान लोगों को भी अलग-अलग संकल्प और अनुशासन के माध्यम से अपनी बुराइयां छोड़ने के लिए प्रेरित किया गया। धीरे-धीरे उनकी आदतें छूट गईं।
आचार्यश्री ने कहा कि निर्णय लेने की क्षमता ही मनुष्य को महान बनाती है। गलत आदत छोड़ने का दृढ़ निर्णय व्यक्ति के आत्मबल और व्यक्तित्व का विकास करता है।

सात प्रमुख व्यसनों से बचने की प्रेरणा
आचार्य श्री ने श्रद्धालुओं को व्यसनों से बचने की प्रेरणा देते हुए कहा कि जुआ और सट्टा व्यक्ति को आर्थिक और मानसिक रूप से कमजोर करते हैं। निवेश या सट्टेबाजी की प्रवृत्ति व्यक्ति के लिए परेशानी का कारण बन सकती है। उन्होंने ईमानदारी से कमाई करने पर जोर देते हुए कहा कि गलत तरीके से कमाया गया धन अंततः परेशानी का कारण बनता है।

उन्होंने आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए कहा कि किसी भी समस्या का समाधान जीवन समाप्त करना नहीं हो सकता। “दूसरों को मारना पाप है और स्वयं को मारना महापाप है।” उन्होंने कहा कि निराशा और हीनभावना से ग्रस्त व्यक्ति आत्महत्या जैसा कदम उठाता है, जबकि जीवन है तो हर समस्या का समाधान संभव है।


आचार्यश्री ने मांस-मदिरा के सेवन से दूर रहने, परस्त्री गमन एवं अनैतिक आचरण से बचने, चोरी और मिलावट जैसे कृत्यों का त्याग करने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि व्यक्ति का चरित्र ही उसकी वास्तविक पहचान है। “करियर कैरेक्टर से बनता है।” चरित्र का हनन होने पर व्यक्ति के जीवन की प्रतिष्ठा और विश्वास दोनों प्रभावित होते हैं।

गुटका-सिगरेट छोड़ने का आह्वान
आचार्य श्री ने गुटका, सिगरेट और अन्य नशीले पदार्थों के सेवन से होने वाले शारीरिक नुकसान के बारे में भी श्रद्धालुओं को समझाया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को स्वयं पर नियंत्रण रखना चाहिए। आत्मसंयम के अभाव में व्यक्ति धीरे-धीरे व्यसन की गिरफ्त में चला जाता है और उसका शरीर तथा परिवार दोनों प्रभावित होते हैं।

उन्होंने कहा कि माता-पिता की सेवा से जीवन में संस्कार और साहस मिलता है, जबकि गुरु की सेवा से ज्ञान की प्राप्ति होती है। संतान को जन्म देना ही माता-पिता का दायित्व पूरा करना नहीं है, बल्कि उसे अच्छे संस्कार देना भी जरूरी है।

आचार्य श्री ने भगवान श्रीकृष्ण और देवकी से जुड़ा प्रसंग सुनाकर श्रद्धालुओं को माता-पिता की सेवा और सम्मान के लिए प्रेरित किया। जीवन सात्विक होना चाहिए और दिखावे से दूर रहना चाहिए। पर्युषण पर्व आत्मशुद्धि और आत्मनिरीक्षण का अवसर है। इस दौरान व्यक्ति को अपनी बुराइयों का त्याग कर सद्गुणों को अपनाने का संकल्प लेना चाहिए।

65 उपवास की अनुमोदना
श्री साधुमार्गी शांत क्रांति जैन श्रावक संघ के अध्यक्ष सम्पतराज जी डेढ़िया ने बताया कि कन्हैयालाल जी भुगड़ी द्वारा की जा रही 65 उपवास की तपस्या की संघ की ओर से खूब-खूब अनुमोदना की गई। इस अवसर पर तपस्वी एवं उनके समस्त परिवार के प्रति भी संघजनों ने अनुमोदना व्यक्त की।

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