श्रीमद् भागवत भक्ति, ज्ञान एवं वैराग्य की त्रिवेणी है : बांके बिहारी गोस्वामी

श्रीमद् भागवत भक्ति, ज्ञान एवं वैराग्य की त्रिवेणी है : बांके बिहारी गोस्वामी


राजनंदगांव(अमर छत्तीसगढ़) 14 सितंबर । प्रयागराज के गंगा, यमुना एवं सरस्वती की तरह ही श्रीमद् भागवत भक्ति ज्ञान एवं वैराग्य की त्रिवेणी है। आत्मा परमात्मा का स्वरूप है ,आत्मा का लय चैतन्य परमब्रह्ममय हो जाता है । परिवार माया का जाल है ।

माता-पिता पुत्र – पुत्री सगे – संबंधी भवसागर की लहरें हैं, यह मन – बुद्धि – मस्तिष्क को व्यग्र कर देते हैं तथा परमात्मा की कृपा में बाधक हो जाते हैं । जीव कर्म बंधन में ना पड़े । कर्म ईश्वर को अर्पण कर देवे । कथा श्रवण से भगवान के प्रति अनुराग उत्पन्न हो जाता है ।

जीव भगवान का आश्रम लेता है तब उसे संसार निरर्थक लगता है जीव मानोचित्त से भगवान का मनन चिंतन करें तथा श्रवण करें ,तब ज्ञान उत्पन्न होगा , ज्ञान संसार से वैराग्य करता है । जिसमें भक्ति आ गई ज्ञान – वैराग्य प्राप्त हो गया उसे मोक्ष प्राप्त हो जाता है ।
लोहिया परिवार द्वारा पितृ मोक्षार्थ श्री अग्रसेन भवन में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ सप्ताह के प्रथम दिवस की कथा की विवेचना करते हुए व्यास पीठ पर विराजित वृंदावन के सुप्रसिद्ध भागवत आचार्य बांके बिहारी गोस्वामी जी ने श्रीमद् भागवत के महात्म की महत्ता बताते हुए कहा कि देवर्षि नारद अनेक तीर्थ का भ्रमण करते हुए वृंदावन गए ।

वहां उन्होंने एक सुंदर युवा स्त्री को विलाप करते हुए देखा तथा उसके समक्ष दो वृद्धो को मूर्छित अवस्था में देखा । तब नारद ने उस युवा स्त्री से विलाप करने का कारण पूछा। युवा स्त्री ने कहा कि मेरा नाम भक्ति है और यह दोनों जो वृद्ध मूर्छित पड़े हैं यह मेरे पुत्र ज्ञान एवं वैराग्य है ।

वृंदावन की धरती में पैर रखते ही मैने युवा अवस्था को प्राप्त कर लिया एवं मेरे दोनों पुत्र वृद्ध हो गए । वृंदावन लीला की धरती है यहां आकर वृद्ध भी युवा हो जाते हैं। जिन्हें तरुणाई चाहिए उन्हें भक्ति का आश्रय लेना जरूरी है । भगवान ज्ञान का विषय नहीं है यह आस्था, श्रद्धा एवं विश्वास के प्रतीक हैं ।

भगवान कृपानिधान है ,भक्तवत्सल है। नारद जी सौंनकादिक ऋषियों से श्रीमद् भागवत कथा का श्रवण करते हैं । भागवत ज्ञान यज्ञ है इसमें ज्ञान की आहुति दी जाती है मनुष्य जन्म प्राप्त हुआ है तो श्रीमद् भागवत कथा का श्रवण करना ही चाहिए । भागवत की गर्जना एवं जय घोष से जीव के पाप नष्ट हो जाते हैं ।

केवल श्रीमद् भागवत का महात्म श्रवण मात्र की गूंज ज्ञान एवं वैराग्य के कानों में पड़ने म से वे तरुणाई को प्राप्त कर लेते हैं ।
पूज्य आचार्य श्री ने आत्मदेव ब्राह्मण के कथा की विवेचना की । सांसों की महत्ता बताते हुए कहा कि भगवान का गुणगान करने से सांसों की गति बढ़ जाती है हम सांसों को संजो कर रखें , मौन रहे , प्रभु का गुणानुवाद करें ।

धुंधकारी एवं गोकर्ण जन्म के प्रसंग की कथा बताते हुए आचार्य श्री ने कहा कि धुंधकारी की करगुजारियों से परेशान होकर पिता आत्मदेव जंगल में चले गए धुंधकारी भी मृत्यु को प्राप्त होकर प्रेत योनि को प्राप्त हुआ ।

भाई गोकर्ण ने अपने माता-पिता एवं भाई धुंधकारी का गया श्राद्ध किया किंतु धुंधकारी का मोक्ष नहीं हुआ । तब गोकर्ण ने उसे श्रीमद् भागवत कथा सुनाई ।


पूज्य आचार्य श्री ने कहा कि किसी भी कार्य को पूरा करने हेतु सर्वप्रथम संकल्प लेना आवश्यक है । शिव परिवार की महिमा का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि उनके वाहन आपस में शत्रु होने के बावजूद मिलजुल कर रहते हैं हमें भी अपने परिवार में सामंजस्य के साथ बड़ों का सम्मान करते हुए रहना चाहिए । जीव का जीवन सात दिवस का ही होता है ।

सोमवार से रविवार के बीच ही जीवन एवं मृत्यु हुआ करती है । रविवार एतवार विश्वास को जगाता है , सोमवार सुमति को देने वाला है , मंगलवार मंगलकारी होता है, बुधवार बुद्धि को निर्मल करता है , गुरुवार को गुरु की कृपा प्राप्त होती है जिसे गुरु की प्राप्त कृपा प्राप्त हो जाए उसका संसार से मोह भंग हो जाता है , शुक्रवार कल्याण का कारक है यह जीव का कल्याण कर देता है , शनिवार शांति को प्रदान करने वाला है ।

मनुष्य की आयु कितनी भी क्यों ना हो इन्हीं सात दिवस के बीच ही जीवन चक्र चलता है । जीवन के एक पल का भी भरोसा नहीं है, अतः हर पल सत्संग करते रहना चाहिए । व्यास पीठ की महत्ता बताते हुए आचार्य श्री ने कहा कि व्यास आसन पर बैठे वक्ता के सामने पिता , गुरु या राजा भी आ जाए तो वह आसान को प्रणाम करें ।

व्यास गद्दी की महत्ता अपरंपार है । नदी को पार करने के लिए नौका की आवश्यकता होती है ,उसी प्रकार भवसागर को पार करने के लिए श्रीमद् भागवत रूपी नौका में सवार होना परम आवश्यक है । वेद, पुराण , उपनिषद पर शंका नहीं करनी चाहिए तथा उसे पर कुतर्क कभी नहीं करना चाहिए ।

परमेश्वर प्रत्येक जीव के कण कण में व्याप्त है, जिस प्रकार फूल में सुगंध दूध में घी व्याप्त रहता है पर वह दृश्य नहीं होता । परमात्मा भूखा उठाता है पर किसी को भूखा सुलाता नहीं है । साढे तीन अक्षर का ब्रह्म है जो ज्ञान से वैराग्य की ओर ले जाता है ।

कथा प्रसंग के दौरान लोहिया परिवार की लाडली बिटिया ने परमब्रह्म बांकेबिहारी का सुंदर स्वरूप धारण कर सजीव झांकी से पूरे कथा पंडाल में उपस्थित श्रद्धालु माता – बहनों एवं बंधुओं को हर्षित कर दिया । श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का शुभारंभ सुबह श्री गायत्री मंदिर से भव्य श्री भागवत पोथी एवं कलश यात्रा के साथ हुआ ।

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