अनुभव जीवन की राह में जलते हुए चिराग के समान है – आचार्यश्री विजय राज जी महाराज साहब

अनुभव जीवन की राह में जलते हुए चिराग के समान है – आचार्यश्री विजय राज जी महाराज साहब

ब्यावर राजस्थान (अमर छत्तीसगढ़) 22 सितंबर । श्री साधु मार्गी शांत क्रांति जैन श्रावक संघ की ओर से आयोजित ब्यावर वर्षावास 2026 के भक्ति समुल्लास चातुर्मास प्रवचन में अनुभव सप्ताह के तहत आचार्य श्री विजय राज जी महाराज साहब ने ‘अनुभव की प्राप्ति कैसे होती है’ विषय पर प्रवचन दिया। उन्होंने कहा कि अनुभव जीवन की राह में जलते हुए चिराग के समान है, जो व्यक्ति के जीवन को ज्ञान और सकारात्मक दृष्टिकोण का प्रकाश प्रदान करता है।

आचार्यश्री ने कहा कि अनुराग से रुचि पैदा होती है, रुचि से तर्क, तर्क से प्रयोग और प्रयोग से अनुभव की प्राप्ति होती है। अनुभव अनुराग से उत्पन्न होता है।


उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि जब उनसे अनुभव के बारे में पूछा गया तो उन्होंने अनुभव को जीवन की राह में जलते हुए चिराग के समान बताया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार चिराग अंधकार में प्रकाश देता है, उसी प्रकार अनुभव जीवन को सही दिशा और उजाला प्रदान करता है। स्वामी विवेकानंद के कथन का उल्लेख करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि अनुभव के बिना केवल शाब्दिक ज्ञान अंधा होता है, लेकिन जब ज्ञान के साथ अनुभव जुड़ जाता है तो वही ज्ञान नेत्रवान बनकर सम्यक ज्ञान का रूप ले लेता है।

साधन के साथ साधना को महान बनाता है अनुभव
आचार्यश्री ने कहा कि सोने को परखने के लिए उसे घसना पड़ता है, उसी प्रकार इंसान की वास्तविक परख भी उसके साथ बसकर ही की जा सकती है। किसी व्यक्ति के स्वभाव, गंभीरता और गहराई की सही पहचान दूर रहकर नहीं हो सकती। अनुभव ही व्यक्ति की वास्तविक पहचान कराता है। उन्होंने कहा कि अनुभव साधन के साथ साधना को महान बनाता है। साधन हमेशा साथ रहने वाले नहीं हैं। संयोग के साथ वियोग भी निश्चित है। साधनों के प्रति अनुराग रखना भी जीवन के अनुभव का हिस्सा है।

भवन नहीं, भावना से मिलता है आनंद
आचार्य श्री ने कहा कि एक समय परिवार बड़े होते थे और भवन छोटे, लेकिन आज भवन बड़े और परिवार छोटे होते जा रहे हैं। जबकि जीवन में भवन से अधिक भावना बड़ी होनी चाहिए। भावना बड़ी और सकारात्मक हो तो छोटे भवन में भी आनंद की अनुभूति की जा सकती है। उन्होंने कहा कि जीवन में वास्तविक तृप्ति भवन से नहीं, बल्कि अच्छी भावना से मिलती है।
उन्होंने कहा कि चेहरे के साथ चरित्र का सुंदर होना भी जरूरी है। केवल बाहरी रूप और दिखावे से व्यक्ति महान नहीं बनता। वास्तविक सुंदरता अच्छे आचरण, संस्कार और चरित्र से आती है।

हरिगमेशी मुनि का प्रसंग सुनाया
आचार्य श्री ने हरिगमेशी मुनि का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि वे शरीर से बेडौल और रंग-रूप से सामान्य थे। लोग उनसे घृणा और तिरस्कार करते थे, लेकिन जब उन्होंने मुनि जीवन अंगीकार किया तो उनके गुणों के कारण देवता भी उनकी पूजा करने लगे। यक्ष देवता चौबीस घंटे उनकी सेवा में तत्पर रहते थे। उन्होंने कहा कि अनुभवी व्यक्ति बाहरी साधनों को नहीं, बल्कि व्यक्ति के गुणों को देखता है।

परिस्थिति नहीं, मनःस्थिति महत्वपूर्ण*
आचार्य श्री ने हर परिस्थिति में समभाव और सकारात्मक रहने की प्रेरणा देते हुए एक सेठ की चार बहुओं का प्रसंग सुनाया। जब चारों से पूछा गया कि उन्हें कौन सा मौसम पसंद है तो पहली ने गर्मी, दूसरी ने सर्दी और तीसरी ने वर्षा ऋतु को पसंद बताया। चौथी बहू ने कहा कि मौसम कोई भी हो, मनःस्थिति अच्छी होनी चाहिए।
आचार्य श्री ने कहा कि यह बात जीवन के सिद्धांत और अनुभव को दर्शाती है। यदि मनःस्थिति अच्छी है तो हर परिस्थिति, हर वस्तु और हर ऋतु में व्यक्ति आनंद का अनुभव कर सकता है। इसलिए परिस्थितियों को बदलने से अधिक आवश्यक अपनी दृष्टि और मनःस्थिति को सकारात्मक बनाना है।

संगठन में शक्ति का संदेश
परिवार में एकता और संगठन की शक्ति का संदेश देते हुए आचार्य श्री ने एक वृद्धा और उसके चार बेटों का प्रसंग सुनाया। वृद्धा ने अपने चारों बेटों को एकता के साथ रहने की सीख देने के लिए लकड़ियों का गट्ठर तोड़ने को कहा। चारों बेटों ने मिलकर लकड़ियों का गट्ठर तोड़ने का प्रयास किया, लेकिन वह नहीं टूटा। इसके बाद एक-एक लकड़ी अलग करके तोड़ने को कहा गया तो वह आसानी से टूट गई।
आचार्य श्री ने कहा कि परिवार और संगठन में भी यही सिद्धांत लागू होता है। एकता में शक्ति है और बिखराव में कमजोरी। परिवार को सकारात्मक दृष्टिकोण और संगठन की भावना के साथ रखने से कठिन से कठिन परिस्थितियों का सामना किया जा सकता है।

सकारात्मक दृष्टिकोण से जीवन बनता है महान
आचार्य श्री ने सुमतिनाथ भगवान का स्मरण करते हुए भजन प्रस्तुत किया और श्रद्धालुओं को सदैव सकारात्मक दृष्टिकोण रखने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि सकारात्मक दृष्टि ही दृष्टिकोण को महान बनाती है और दृष्टिकोण को महान बनाने में अनुभव की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
उन्होंने कहा कि जन्म के साथ व्यक्ति को दृष्टि मिलती है, लेकिन सही दृष्टिकोण अनुभव से विकसित होता है। अनुभव की राह पर चलने से दृष्टिकोण परिपक्व होता है और अनुभवयुक्त ज्ञान ही जीवन को सही दिशा देता है।
तपस्या का दौर निरंतर गतिमान जिसमें दिव्या जी सुराणा के 15 की, संतोष जी सुराणा 18 की तप, वैभव जी डेढ़िया 24 की तपस्या ओर भी बहुत गुप्त तपस्या गतिमान है।
बाहर से निरंतर श्रद्धालु का आवागमन हो रहा है,जिसमें किशनगढ़, मुम्बई,चेन्नई, आसींद से पधारे थे।
धर्मसभा के दौरान किशनगढ़ महिला मंडल की सदस्यों ने भी अपनी भावनाएं व्यक्त कीं।

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