ब्यावर राजस्थान (अमर छत्तीसगढ़) 7 अक्टूबर । श्री साधु मार्गी शांत क्रांति जैन श्रावक संघ की ओर से भक्ति समुल्लास वर्षावास 2026 के तहत चातुर्मास के दसवें सप्ताह को ‘बदलाव सप्ताह’ के रूप में मनाया जा रहा है। मंगलवार को बिरद भवन में आयोजित विशेष प्रवचन में आचार्य श्री विजय राज जी महाराज साहब ने कहा कि केवल शिक्षा प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि शिक्षा के साथ संस्कार और उसे जीवन में धारण करने की भावना जरूरी है।
आचार्य श्री ने कहा कि बदलाव के चार चरण हैं—पहला शिक्षा, दूसरा दीक्षा, तीसरा परीक्षा और चौथा तितिक्षा। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिसमें संस्कार शामिल हों।
उच्च शिक्षा के साथ संस्कार ही व्यक्ति के जीवन में वास्तविक बदलाव लाते हैं। संस्कार के बिना शिक्षा अधूरी है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि सोने की अंगूठी को केवल सोने की अंगूठी कहा जाता है, लेकिन उसमें हीरा जड़ दिया जाए तो वही अंगूठी हीरे की अंगूठी कहलाती है। इसी प्रकार शिक्षा रूपी सोने में संस्कार रूपी हीरा जुड़ जाए तो जीवन मूल्यवान बन जाता है।
उन्होंने कहा कि शिक्षा का कोई विरोधी नहीं होता, लेकिन शिक्षा संस्कारयुक्त होनी चाहिए। शिक्षा की वास्तविक शक्ति संस्कार है। दीक्षा का अर्थ प्राप्त शिक्षा को जीवन में धारण करना है। व्यक्ति को हित और अहित की पहचान हो जाए तथा सही को जीवन में अपनाने की क्षमता विकसित हो, यही शिक्षा की सार्थकता है।
आचार्य श्री ने कहा कि परीक्षा अकेले देनी पड़ती है और उसका परिणाम सार्वजनिक होता हैं। इसी प्रकार जीवन में आने वाली सम-विषम और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियां व्यक्ति की परीक्षा लेती हैं। यदि व्यक्ति शिक्षा और दीक्षा से युक्त है तो वह विपरीत परिस्थितियों में भी सफल हो सकता है।
उन्होंने तितिक्षा को संयम से जोड़ते हुए कहा कि संयमयुक्त शिक्षा ही जीवन में वास्तविक बदलाव लाती है। बदलाव के लिए सबसे पहले उसके प्रति रुचि पैदा करनी होगी। बिना रुचि के बदलाव संभव नहीं है। बदलाव की बुनियाद रुचि के भाव हैं। कामयाब वही लोग होते हैं जो परिस्थितियों को बदलने का प्रयास करते हैं, जबकि नाकामयाब लोग डर के कारण अपने फैसले बदलते रहते हैं। हमें जीवन में कामयाबी हासिल करने के लिए अपने भीतर बदलाव की रुचि पैदा करनी चाहिए।
आचार्य श्री ने कहा कि व्यक्ति अपनी आदतों, आचरण और स्वभाव से परेशान रहता है, लेकिन स्वयं को बदलना नहीं चाहता। कोई व्यक्ति दूसरों को परेशान करने के लिए पैदा नहीं हुआ है। हम अपनी आदतों से परेशान होते हैं और दोष दूसरों में तलाशते हैं। यदि जीवन में बदलाव लाना है तो अपने भीतर अनुराग और रुचि पैदा करनी होगी। दुनिया में कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को तब तक नहीं बदल सकता, जब तक वह स्वयं बदलाव के लिए तैयार न हो।
कल पर टालने की आदत छोड़ें
आचार्य श्री ने काम को कल पर* टालने वालों को एक प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि एक सेठ और सेठानी थे। सेठानी ने पास में आए जैन संत का व्याख्यान सुनने की इच्छा जताई। सेठ ने कहा कि कल चलेंगे। इसी तरह तीन-चार दिन बीत गए और वह हर बार बात को कल पर टालता रहा। एक दिन सेठ की तबीयत खराब हो गई और उन्होंने डॉक्टर को बुलाने के लिए कहा। नौकर ने भी कह दिया कि डॉक्टर को कल बुला लेंगे। इस प्रसंग के माध्यम से आचार्य श्री ने संदेश दिया कि जीवन में किसी भी अच्छे कार्य को कल पर नहीं टालना चाहिए।
समय बदला, अब व्यवहार बदलने की जरूरत
आचार्य श्री ने बिरद भवन से जुड़े पुराने संस्मरण साझा करते हुए कहा कि वर्ष 1990 में महावीर भवन में चातुर्मास के दौरान प्रवास रहा था। वर्ष 2002 में बिरद भवन में चातुर्मास हुआ और अब 24 वर्ष बाद वर्ष 2026 में नवकार भवन में चातुर्मास हो रहा है। पुराने दिनों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि समय और जीवन बहुत बदल गया है, लेकिन हमें यह विचार करना चाहिए कि हमारे भीतर कितना बदलाव आया है।
उन्होंने कहा कि वेशभूषा, खान-पान, मकान और जीवनशैली बदल रही है, लेकिन सबसे अधिक बदलाव हमारे व्यवहार, आचरण और आदतों में आना चाहिए। डिग्री से ज्यादा जरूरी अच्छे संस्कार हैं। सत्संग और अच्छी संगति से संस्कार प्राप्त होते हैं। ऐसी शिक्षा केवल स्कूलों में नहीं मिलती, बल्कि धर्मगुरुओं और संतों के सान्निध्य से जीवन मूल्यों का विकास होता है।
आचार्य श्री ने कहा कि हम अक्सर केवल सुनने के लिए सुनते हैं, जबकि सुनने के बाद जीवन में बदलाव आना चाहिए।
उन्होंने सामाजिक और पारिवारिक संबंधों में बढ़ती दूरी पर भी चिंता जताई। कहा कि लोग साथ रहकर भी ईर्ष्या करते हैं, रिश्ते निभाते हुए भी दुश्मनी रखते हैं और सामने तारीफ करते हुए भीतर से विरोध की भावना रखते हैं। कपट, शिकायत और ईर्ष्या को छोड़कर समर्पण और अपनत्व के साथ रहना चाहिए।
आचार्य श्री ने कहा कि जैन धर्म किसी का विरोध नहीं करता, अनुरोध की भाषा जीवन में परिवर्तन का मार्ग दिखाती है। विरोध की भाषा से बदलाव नहीं आता। प्रकृति स्वयं परिवर्तन का संदेश देती है और परिवर्तन के बिना सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती।
उन्होंने कहा कि जीवन में हर समय शिकायत करते रहना उचित नहीं है। साइलेंट मोड रिश्तों और मित्रता को तोड़ने का काम करता है। संवाद और अपनत्व बनाए रखना जरूरी है। यदि संत भी साइलेंट मोड में चले जाएं तो श्रावक-श्राविकाएं उनसे मार्गदर्शन कैसे प्राप्त करेंगे।
आचार्य श्री ने कहा कि आत्मजागरण और जीवन में बदलाव लाना है तो संतों के साहित्य और उनके सान्निध्य से प्रेरणा लेनी चाहिए। परिवार में अपनत्व, प्रेम और संवाद की भावना बनाए रखनी चाहिए। यही वास्तविक बदलाव की शुरुआत है।
धर्मसभा के दौरान छत्तीसगढ़ से आए महावीर जी ने अपनी भावनाएं प्रस्तुत कीं तथा सुंदर गीतों की प्रस्तुति देकर उपस्थित श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।
आज महाराष्ट्र, कर्नाटक सहित विभिन्न राज्य से लोग उपस्थित थे।
आचार्य श्री विजय राज जी म सा के 68 वे जन्म दिवस के उपलक्ष में 7 दिवसीय भव्य धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन होगा, जिसमें त्याग, तपस्या,ज्ञान,ध्यान, तप की आराधना होगी। इस मौके पर धार्मिक क्रिकेट प्रतियोगिता जैन प्रीमियम लीग का आयोजन होगा।

