राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ़) 6 अक्टूबर । ” उत्साह के साथ-साथ हमें क्वांटिटी नहीं क्वालिटी बढ़ाना चाहिए। यदि हमने ऐसा किया तो देखिए कितना फर्क आता है। हम अपने कार्य में अवश्य सफल होंगे।” उक्त उदगार खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य श्रेयांशप्रभ सागर जी ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जो क्रिया हम कर रहे हैं, उसे उत्साह के साथ करें और उसमें भाव डालें फिर देखिए आपका काम कैसे सफल नहीं होता।
मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने बताया कि ज्ञान वल्ल्भ उपाश्रय भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में आज मुनि श्री श्रेयांशप्रभ सागर जी ने कहा कि उत्साह जीवन में बहुत महत्व रखता है। आप कोई भी कार्य करें उत्साह के साथ करें। उत्साह के साथ कार्य करने से व्यक्ति का कार्य जल्दी होता है और सटीक भी होता है।
आपकी जितनी शक्ति है, उतना ही कार्य करें लेकिन पूरे भाव से करें क्योंकि भाव ही तो उत्साह है। कोई भी मुनि पूरे 12 के 12 तप करने के लिए नहीं कहता, सभी कहते हैं कि एक तप करो लेकिन पूरे भाव एवं उत्साह से करो। भाव के साथ किया गया तप कभी असफल नहीं होता।
मुनि श्री श्रेयांशप्रभ सागर जी ने कहा कि हम तो संसार में बैठे हैं। हमसे पाप होंगे ही परंतु उसपर नियंत्रण तो किया जा सकता है। उत्साह बढ़ाओ, उत्साह होगा तभी अनुमोदना होगी, नहीं तो अनुमोदना नहीं हो सकती।
हमारे क्रियाओं में जितना उत्साह होगा, क्रियाएं उतनी ही सफल होगी। हम जो क्रियाएं कर रहे हैं ,वही हमारे लिए सोना (गोल्ड) है। उत्साह बढ़ाने का प्रयास करो तो पाप क्रिया अपने आप कम हो जाएगी।

