अज्ञानता, आलस्य और व्यसन बदलाव के सबसे बड़े बाधक : आचार्य श्री विजय राज जी

अज्ञानता, आलस्य और व्यसन बदलाव के सबसे बड़े बाधक : आचार्य श्री विजय राज जी


ब्यावर राजस्थान (अमर छत्तीसगढ़) 8 अक्टूबर । श्री साधु मार्गी शांत क्रांति जैन श्रावक संघ की ओर से आयोजित भक्ति समुल्लास वर्षावास 2026 के तहत चातुर्मास प्रवचन में आचार्य श्री विजय राज जी महाराज साहब ने जीवन में बदलाव में बाधक बनने वाले कारण बताए। उन्होंने कहा कि जीवन में बदलाव नहीं होने के पीछे कई कारण हैं, जिनमें अज्ञानता, आलस्य, व्यसन और निर्णय में अस्थिरता प्रमुख हैं।


आचार्य श्री ने कहा कि जो व्यक्ति अज्ञान में लिप्त रहता है और अहंकार में जीता है, वह अपने अस्तित्व और वास्तविक अहमियत को नहीं समझ पाता। जब तक व्यक्ति स्वयं को नहीं पहचानेगा, तब तक उसके जीवन में वास्तविक बदलाव संभव नहीं है। हर व्यक्ति अपने नाम और पद को ही अपनी पहचान मानता है, जबकि सबसे पहली प्राथमिकता यह जानना है कि मैं कौन हूं और मैं क्या हूं।

इन दो प्रश्नों का उत्तर खोजते ही बदलाव की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। उन्होंने कहा कि बिना प्रयोग के बदलाव नहीं आता। व्यक्ति को स्वयं को जानने और पहचानने का प्रयास करना चाहिए। अपनी कमियों को स्वीकार कर उन्हें दूर करने का संकल्प हीआत्मपरिवर्तन की पहली सीढ़ी है।

धर्म के प्रति उत्साह जरूरी
आचार्य श्री ने बदलाव नहीं आने का दूसरा कारण आलस्य बताते हुए कहा कि व्यक्ति संसार के कार्यों को उत्साह के साथ करता है, लेकिन धर्म के कार्य में आलस्य और उत्साह की कमी दिखाई देती है। धर्म के प्रति उत्साह चेहरे पर दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि आईना कभी झूठ नहीं बोलता है। चेहरे की प्रसन्नता और व्यवहार से पता चलता है कि व्यक्ति के भीतर धर्म के प्रति कितनी आस्था है।उन्होंने कहा कि धर्म वर्तमान को सुधारता है और भविष्य को संवारता है।

इसलिए धर्म के प्रति गहरी आस्था होनी चाहिए। जब धर्म हृदय में उतरता है तो उसकी प्रसन्नता चेहरे पर दिखाई देती है। उन्होंने भारतीय संस्कृति और जैन सिद्धांतों की वैज्ञानिकता का उल्लेख करते हुए कहा कि धर्म के प्रति गहरी आस्था रखने से जीवन में निश्चित रूप से सकारात्मक बदलाव आता है।

नशा नाश का द्वार
आचार्य श्री ने बदलाव नहीं आने का तीसरा प्रमुख कारण व्यसन बताते हुए कहा कि नशा नाश का द्वार है। नशे के कारण सबसे पहले धन का, फिर तन का और उसके बाद व्यक्ति की प्रतिष्ठा और स्वाभिमान का नाश होता है। उन्होंने कहा कि गुटखा और अन्य व्यसन स्वास्थ्य के लिए बेहद नुकसानदायक हैं, फिर भी अनेक लोग इनका सेवन करते हैं।


उन्होंने कहा कि व्यसन धीरे-धीरे व्यक्ति को अन्य बुरी आदतों की ओर ले जाता है और फिर जीवन में बदलाव की संभावना कम होती जाती है। आज नशे को कई लोगों ने फैशन बना लिया है, जबकि यह व्यक्ति को उसके वास्तविक अस्तित्व से दूर करता है। विशेष रूप से युवा पीढ़ी को व्यसन से दूर रहकर अपने जीवन और भविष्य को सही दिशा देनी चाहिए।

आचार्य श्री ने कहा कि जीवन में बदलाव का अवसर बार-बार नहीं मिलता। मानव जन्म, जिनवाणी और धर्मगुरु की वाणी मिलना सौभाग्य की बात है। इसलिए इस अवसर का सदुपयोग करते हुए जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास करना चाहिए।

गरीब के पास हिम्मत नहीं, अमीर को जरूरत नहीं और मध्यम वर्ग को फुर्सत नहीं
आचार्य श्री ने कहा कि आज बदलाव इसलिए भी नहीं आ पा रहा है क्योंकि गरीब के पास हिम्मत नहीं, अमीर को जरूरत नहीं और मध्यम वर्ग के पास फुर्सत नहीं है। व्यक्ति को अपनी परिस्थितियों से ऊपर उठकर जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझना होगा। उन्होंने कहा कि ऊंची सोच और अच्छी संगति जीवन में बड़ा परिवर्तन ला सकती है।

संत का दर्शन और मित्र का मार्गदर्शन बदलता है जीवन
आचार्य श्री ने कहा कि व्यक्ति को अपने जीवन के कुछ महत्वपूर्ण निर्णय बार-बार नहीं बदलने चाहिए। संत का दर्शन और अच्छे मित्र का मार्गदर्शन जीवन में बदलाव लाने की शक्ति रखते हैं। उन्होंने कहा कि श्रद्धा एक होनी चाहिए और सेवा अनेक होनी चाहिए। सेवा भावना से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आता है। उन्होंने कहा कि अच्छे संत और सच्चे मित्र सौभाग्य से मिलते हैं। ग्रंथ और संत जीवन बदलने की शक्ति रखते हैं तथा श्रद्धा ही वास्तविक बदलाव लाती है। व्यक्ति को सेवा का अवसर कभी नहीं गंवाना चाहिए।

सेवा से बदल जाता है जीवन
सेवा का महत्व समझाते हुए* आचार्य श्री ने एक प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि एक 10 वर्षीय अनाथ बालक को होटल में वेटर और प्लेट धोने का काम मिला। 18 वर्ष की उम्र में एक बुजुर्ग महिला होटल में आई। बालक ने बीमारी के दौरान उसकी सेवा की, दवाई लाकर दी और चाय-बिस्किट उपलब्ध कराए। महिला ने भावुक होकर उसे ‘बेटा’ कहकर पुकारा। बालक ने कहा कि अनाथ होने के बाद पहली बार किसी ने उसे बेटा कहा है।

इसके बाद दोनों के बीच आत्मीय संबंध बन गए। प्रसंग के अनुसार होटल मालिक ने जब बालक की सेवा भावना और महिला के प्रति उसके व्यवहार को देखा तो प्रभावित होकर होटल उसके नाम कर दिया। आचार्य श्री ने कहा कि यह प्रसंग हमें बताता है कि सेवा कभी व्यर्थ नहीं जाती। जो लोग पुण्य करते हैं, वे सरताज बन जाते हैं और जो पापों में लिप्त रहते हैं, वे मोहताज बन जाते हैं।

श्रद्धा, सेहत, शांत मन और सच्चा मित्र सबसे बड़ी दौलत
आचार्य श्री ने कहा कि व्यक्ति की सबसे बड़ी दौलत श्रद्धा है। इसके साथ स्वस्थ शरीर, शांत मन और सच्चा मित्र मिल जाए तो उससे बड़ा धनवान व्यक्ति संसार में कोई नहीं। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को कल का इंतजार नहीं करना चाहिए। आज का काम आज ही पूरा करने का प्रयास करना चाहिए।


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