राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ़) 9 अक्टूबर । ” हमारा प्रयास कभी गलत नहीं होता बस उसे सही दिशा की जरूरत होती है। पुरुषार्थ हमारा गलत नहीं है किंतु जिस दिशा में पुरुषार्थ होना चाहिए था , उस दिशा में हमने कुछ नहीं किया। विचार तो आते हैं और विचारों को रोको मत बल्कि उसे सही दिशा दो तो आप अवश्य अपने उद्देश्य में सफल होंगे।” उक्त उदगार खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य श्रेयांशप्रभ सागर जी ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जितना सहज भाव हमारे में आएगा उतना हमारे लिए ज्ञान प्राप्ति का रास्ता सरल होगा।
मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने बताया कि ज्ञान वल्लभ उपाश्रय भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में आज मुनि श्री श्रेयांशप्रभ सागर जी ने कहा कि हम सोचते हैं कि हमारी दिशा सही है किंतु सामने वाली की दिशा भी तो सही है। सही दिशा समझने का प्रयास करोl
उन्होंने कहा कि हम जो चीज ढूंढ रहे हैं,वह तो हमारे पास पहले से ही है। हमारे मन को पवित्र करने के लिए जो चीज चाहिए वह हमारे पास ही है, फिर हम किसी नई चीज की तलाश क्यों कर रहे हैं! जब नींद लेने में या फिर खाने में कोई नयापन आपको नहीं चाहिए और पुराने तरीके से आपका काम चल जाता है तो फिर मन को पवित्र करने में क्यों नया खोजते हो।
मुनि श्री श्रेयांशप्रभ जी ने कहा कि जब हम अपने आपको जानने का प्रयास करते हैं तब ही हमें नई चीज की जरूरत पड़ती है, हम नया चाहते हैं। आखिर हम अपने आपको जानने का प्रयास क्यों नहीं करते। सिर्फ पांच मिनट ही अपने बारे में सोचें। हमने नींद को, खाने को अपने शरीर का हिस्सा बना लिया है किंतु हमने अपने जीवन को अपना नहीं माना, इसीलिए हम अपने आपको जानने का प्रयास नहीं करते। हमारे भीतर जब तक स्वीकार का भाव नहीं आएगा तब तक हम कुछ सीख नहीं पाएंगे।
मुनि श्री ने कहा कि हमें इन पांच मिनट में यह सोचना है कि मैंने दिन भर क्या किया और इसे मैं क्या-क्या सीख सकता हूं। हमारी जो मानसिकता है उससे फ्री होकर इस बारे में अवश्य सोचें। हमें अपने गुणों के बारे में सीखने की आदत डालनी होगी। जब मैं अपने बारे में जानूंगा तभी मैं भगवान के बारे में जान पाऊंगा। हमारी प्रवृत्ति पाप की है। हम यह सोच सकते हैं कि पाप से भी हम क्या अच्छा सीख सकते हैं। उन्होंने कहा कि स्वयं के बारे में जानने का प्रयास अवश्य करो।

