‎‎चातुर्मासिक प्रवचन… अपने मन के द्वार को खोलो और उसमें खो जाओ-मौलिक प्रभ जी

‎‎चातुर्मासिक प्रवचन… अपने मन के द्वार को खोलो और उसमें खो जाओ-मौलिक प्रभ जी



‎राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ़) 1 नवम्बर। ” अपने मन के द्वार को खोलो और उसमें खो जाओ। अपने को जानने का प्रयास करो। पुरुषार्थ करो और सिर्फ पांच मिनट अपने आप को जानने के लिए दो। “उक्त उदगार खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य मौलिकप्रभ सागर जी ने  व्यक्त किए।
‎              मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने बताया कि ज्ञान वल्लभ उपाश्रय भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में आज मुनि श्री मौलिकप्रभ सागर जी ने फरमाया कि इस दुनिया में हम आए हैं तो हमें अपने आप को जानना ही चाहिए कि हम इस दुनिया में क्यों आए हैं? हम जिस मकसद से इस दुनिया में आए हैं, उस मकसद को अवश्य पूरा करना चाहिए, ताकि हमारा यहां आना सफल हो सके । उन्होंने कहा कि हम सब कहते हैं कि यह मेरा है – यह मेरा है किंतु ऐसा कुछ भी नहीं है।इस दुनिया में मेरा कुछ भी नहीं है। हमें अपने आप को जानना है तो हमें अपने लिए समय अवश्य निकलना होगा।
‎** सस्पेंस एक टाइम तक ही अच्छा लगता है-श्रेयांशप्रभ
‎                मुनि श्री श्रेयांशप्रभ सागर जी ने भी आज जैन रामायण कि आगे की कथा बताते हुए महाराज दशरथ और कैकई के विवाह का प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि राजा दशरथ एक साधु के वेश में कैकई के स्वयंवर में पहुंचे थे। उन्होंने कहा कि राजा का तेज अलग ही होता है। कैकई ने उनके गले में वरमाला डाल दी और उनका विवाह हो गया। स्वयंवर में पहुंचे राजाओं ने नाराजगी जाहिर करते हुए युद्ध छेड़ दिया जिन्हें महाराज दशरथ ने जीत लिया तब कहीं उनके छुपे हुए वेश का खुलासा हुआ। उन्होंने कहा कि सस्पेंस भी एक समय तक अच्छा लगता है। इसके बाद रहस्य को खोलना ही पड़ता है।
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