राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ़) 4 नवम्बर। ” जब हम संसार रूपी सागर में डूब जाते हैं और ऐसे समय में सद्गुरु हमें तारने के लिए हाथ आगे बढ़ाते तो हम क्यों चुक जाते हैं। हमें यह मौका कभी नहीं खोना चाहिए। उन्होंने कहा कि सद्गुरु हमें तारने वाला होता है। जिस हृदय में गुरु का वास नहीं होता उस हृदय में प्रभु का वास भी नहीं हो सकता! “उक्त उदगार खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य मौलिकप्रभ सागर जी ने व्यक्त किए।
मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने बताया कि ज्ञान वल्लभ उपाश्रय भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में आज मुनि श्री मौलिकप्रभ सागर जी ने कहा कि “पर” के बारे में हमने बहुत सोच लिया है अब हमें अपने बारे में भी सोचना चाहिए। हम इस संसार में आखिर कब तक भटकते रहेंगे। हमारे हृदय में यदि गुरु का वास होता तो हमारा जीवन अलग ही होता। हमारे भीतर पाप भरा हुआ है। हम कषायों से घिरे हुए हैं।मन में धन सम्पदा का वास है।
मुनि श्री मौलिकप्रभ सागर जी ने आगे कहा कि चिंतन करें कि हमारा जीवन किस प्रकार की राह में है और उसे किस प्रकार की राह में होना चाहिए। उन्होंने कहा कि कषायों से दूर रहें और जीवन को सफल बनाने का प्रयास करें।

