पूना महाराष्ट्र (अमर छत्तीसगढ) ,13 जुलाई। जो अपना जीवन पावन बनाता है उसके लिए मुक्ति के द्वार खुल जाते है। गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी व्यक्ति संत समान जीवन जी सकता है। हमारा आचरण संत के समान पावन व निर्मल होना चाहिए। जिसका मन व विचार पवित्र नहीं है वह इंसान का भव पाकर भी भटकता रहता है।
ये विचार रविवार को पूज्य दादा गुरूदेव मरूधर केसरी मिश्रीमलजी म.सा., लोकमान्य संत, शेरे राजस्थान, वरिष्ठ प्रवर्तक पूज्य गुरूदेव श्रीरूपचंदजी म.सा. के शिष्य, मरूधरा भूषण, शासन गौरव, प्रवर्तक पूज्य गुरूदेव श्री सुकन मुनिजी म.सा. के आज्ञानुवर्ती युवा तपस्वी श्री मुकेश मुनिजी म.सा ने श्रीवर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ,बिबवेवाड़ी पूना के तत्वावधान में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जीवन में धर्म व सद्कर्म करने के लिए कभी इन्तजार नहीं करना चाहिए क्योंकि जीवन क्षणभंगुर होकर कोई भरोसा नहीं कब हमारी सांस थम जाए।
शरीर में कब आधि-व्याधि लग जाए इसका भरोसा नहीं होने से धर्म ध्यान, तप साधना, स्वाध्याय करने में कभी विलंब नहीं करना चाहिए। जब तक शरीर स्वस्थ है तब तक जितना हो सके धर्म व तप त्याग कर लेना चाहिए।

धर्मसभा में सेवारत्न श्री हरीश मुनिजी म.सा. ने कहा कि जीवन में धर्म की राह पर चले बिना सच्चे सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती है। धर्म की साधना से मन विषय वासनाओं से मुक्त होकर एकाग्रचित बनता है। इन्द्रिय भोग में लगे रहने पर दुःख ही मिलेगा ओर मन भटकता रहेगा।
उन्होंने कहा कि जीवन में पाप ओर पुण्य दोनों होते है हमे धर्म ही बताता है कि इनमें से हमारे लिए क्या सही ओर क्या गलत है। धर्म का ज्ञान जीवन से अंधकार मिटाता है ओर आत्मकल्याण की राह खोलता है।
युवारत्न श्री नानेशमुनिजी म.सा. ने कहा कि समय बड़ा बलवान इसलिए कहा जाता है क्योंकि हर खोई चीज वापस पाई जा सकती है लेकिन हाथ से निकला समय कभी वापस लौटकर नहीं आता है। धर्म आराधना का जीवन में जो ये समय मिला है इसका सदुपयोग कर ले क्योंकि बाद में हम चाहेंगे तो भी ये वक्त वापस लौटकर नहीं आएगा।
समय परिवर्तनशील पर एक मात्र इंसान है जो समय के साथ परिवर्तित नहीं होकर स्थिर रहना चाहता है। प्रज्ञारत्न श्री हितेशमुनिजी म.सा. ने भगवान महावीर की अंतिम देशना उत्तराध्ययन सूत्र के साथ वर्णित सुखविपाक सूत्र का वाचन करते हुए कहा कि सुख वह नहीं होता।
जिसके पास सब सुविधाएं है बल्कि सुखी वह होता है जिसके पास कुछ नहीं होकर संतोष होता है। संतोष से बड़ा सुख ओर धन कोई दूसरा नहीं हो सकता। जिसने संतोषरूपी धन प्राप्त कर लिया उसे दुनिया में किसी अन्य सुख की चाह नहीं रह जाती है।
धर्मसभा में प्रार्थनार्थी श्री सचिनमुनिजी म.सा.का सानिध्य भी प्राप्त हुआ। धर्मसभा में कई श्रावक-श्राविकाओं ने एकासन,आयम्बिल, उपवास आदि तप के प्रत्याख्यान भी लिए। धर्मसभा में पूना के साथ चैन्नई,धुलिया,कोलार आदि स्थानों से पधारे श्रावक-श्राविका भी मौजूद थे।

बच्चों के लिए धार्मिक शिविर एवं महिलाओं के लिए प्रश्नमंच का आयोजन
रविवार होने से बच्चों के लिए दोपहर 2.30 से 4 बजे तक बच्चों के लिए धार्मिक शिविर का आयोजन किया गया। इस दौरान प्रार्थनार्थी श्री सचिनमुनिजी म.सा. ने बच्चों को धार्मिक ज्ञान से जुड़ी जानकारी प्रदान की। शिविर में बड़ी संख्या में बच्चे शामिल हुए।
इसी तरह प्रज्ञारत्न श्री हितेशमुनिजी म.सा. के निर्देशन में रविवार दोपहर महिलाओं के लिए प्रश्नमंच का आयोजन किया गया।
इसमें धर्म से जुड़ी प्रश्नोत्तरी हुई। चातुर्मास में नियमित प्रवचन सुबह 8.45 से 9.45 बजे तक होंगे। प्रतिदिन दोपहर 3 से 5 बजे तक का समय धर्मचर्चा के लिए रहेगा। सूर्यास्त के बाद प्रतिक्रमण होगा। भाईयों के लिए रात्रि धर्म चर्चा का समय रात 8 बजे से रहेगा।
प्रस्तुतिः अरिहन्त मीडिया एंड कम्युनिकेशन,

