रायपुर(अमर छत्तीसगढ़) 17 जुलाई। दादाबाड़ी में आत्मोत्थान चातुर्मास 2025 के अंतर्गत चल रहे प्रवचन श्रृंखला में परम पूज्य श्री हंसकीर्ति श्रीजी म.सा. ने धर्मरत्न प्रकरण ग्रंथ का पठन कर रही हैं। इसी क्रम में गुरुवार को उन्होंने कहा कि यह समय हमें चेतावनी दे रहा है कि रिश्तों, खासकर विवाह जैसे पवित्र बंधन की जिम्मेदारियाँ समझें।
आजकल छोटी-छोटी बातों पर घरों में तकरार इतनी बढ़ जाती है कि लोग आवेश में आकर बेहद हिंसक फैसले तक सोच लेते हैं—कभी-कभी हत्या जैसे घोर अपराध भी! पर क्या ऐसा कदम किसी परेशानी का समाधान है? नहीं।
उलटे जीवन कोर्ट-कचहरी और जेल के चक्करों में उलझ जाता है, जहाँ देर से ही सही, गलती का एहसास तो होता है, पर तब तक बहुत कुछ खो चुका होता है।
सोचिए, तेज सिरदर्द से तड़प रहे व्यक्ति की कहानी। उसने दवा खाई, बाम लगाया, मालिश करवाई—फिर भी आराम नहीं। डॉक्टर ने दवा तो दी, पर साथ ही चेताया: हज़ार में एक को इस दवा से ब्रेन हेमरेज हो सकता है।
बस, आदमी ने दर्द झेलना स्वीकार कर लिया; बड़ी जोखिम उठाने से मना कर दिया। यही तो सीख है—क्षणिक राहत के लालच में हम अक्सर बड़े नुकसान की अनदेखी कर देते हैं। वैवाहिक तनाव, क्रोध, या सामाजिक दबाव में किसी चरम कदम का चुनाव भी ऐसा ही जोखिम है: पल भर का आवेश, उम्र भर की यातना।
धार्मिक जीवन में भी यही प्रवृत्ति दिखती है। हम धर्म से जुड़ते तो हैं, पर सतही ढंग से—जैसे किसी ऑफ़र का लाभ उठाने चले हों। जैसे ही प्रतिकूलताएँ आती हैं, श्रद्धा ढीली पड़ जाती है, पूजा-साधना छूटने लगती है, और भीतर का बल कमज़ोर हो जाता है। असली धर्म वह है जो कठिन समय में भी हमारे भीतर संयम, करुणा और विवेक बनाए रखे।
यहीं आती है संकल्प शक्ति की बात। जीवन में कोई भी लक्ष्य—रिश्तों का निभाव, नैतिक आचरण, अध्यात्म का अभ्यास, या निजी उन्नति—दृढ़ निश्चय के बिना पूरा नहीं होता। जब मन ठान लेता है, तो बाधाएँ रास्ता देने लगती हैं। इतिहास ऐसे असंख्य उदाहरणों से भरा है जहाँ अटल संकल्प ने असंभव को संभव बनाया।

लेकिन ध्यान रहे: केवल लक्ष्य तक पहुँचना ही पूर्णता नहीं है; उस यात्रा की नैतिकता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। ऐसा संकल्प किस काम का जो किसी और को पीड़ा पहुँचाकर पूरा हो? यदि हमारी सफलता की कीमत किसी का दुख है, तो वह उपलब्धि अधूरी है। सच्चा संकल्प वही है जिसमें व्यक्तिगत प्रगति के साथ समाज, परिवार और आसपास के लोगों का कल्याण भी शामिल हो।
तो आइए, हम तीन बातों को साधें:
- रिश्तों में जिम्मेदारी और संवाद, ताकि छोटी खटपट बड़ा रूप न ले।
- आवेग पर संयम, ताकि तात्कालिक लाभ के बदले दूरगामी भलाई चुनें।
- गहरा, परिस्थिति-सहन धर्म और नैतिक संकल्प, जो किसी को चोट पहुँचाए बिना हमें आगे बढ़ाए।
यही मार्ग हमें सच्ची सफलता, शांति और नैतिक गौरव तक ले जाता है। यही सच्चे संकल्प की पहचान है।
श्री ऋषभदेव मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष विजय कांकरिया, कार्यकारी अध्यक्ष अभय कुमार भंसाली, आत्मोत्थान चातुर्मास समिति 2025 के अध्यक्ष अमित मुणोत ने बताया कि दादाबाड़ी में सुबह 8.45 से 9.45 बजे साध्वीजी का प्रवचन होगा। आप सभी से निवेदन है कि जिनवाणी का अधिक से अधिक लाभ उठाएं।

