नगपुरा (अमर छत्तीसगढ) 23 जुलाई। श्रमण भगवान श्री महावीर स्वामी ने श्री आचारांग सूत्र में जीवों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हुए फरमाया कि जीव अनेको बार उच्च गौत्र, नीच गौत्र, में उत्पन्न होता है, अनेको बार धनवान तो अनेको बार निर्धन परिवार में जन्म लेता है, कभी सामर्थ्यवान ,तो कभी दीन-हीन का जीवन मिलता है, यह सब कर्म का प्रतिफल है, पुनः कर्म का अनुबंध न हो, आत्मकल्याण का मार्ग मिले इस हेतु कभी भी हीन भावना न लाये और न ही अभिमान पाले ।
निराभिमानी बनना कठिन है, लेकिन रसगौरव, रिद्धि गौरव और शाता गौरव के प्रति जागरूक बनकर हम अभिमान से दूर हट सकते है।

उक्त उद्गार साध्वी श्री लब्धियशा श्री जी म सा ने श्री उवसग्गहरं पार्श्व तीर्थ नगपुरा चातुर्मास प्रवचन माला में व्यक्त किए।
उन्होने आराधकों को संबोधित करते हुए कहा कि आत्मा का स्वभाव सरल है, शांत है, निर्लेप है । कषाय के कारण आत्मा का विभाव कठोर, क्रोधी ,लोभी, मायावी बनता है।
अभिमान भी एक कषाय है। भगवान श्री महावीर स्वामी के पूर्व भव मरीचि के जीवन का दृष्टांत देते हुए बतलाया कि मरीचि को श्री आदिनाथ प्रभु का पोता, भरत चक्रवर्ती का पुत्र होने के साथ साथ भावी वासुदेव, चक्रवर्ती और तीर्थंकर बनने का अभिमान के साथ आनंद हुआ फलतः तीर्थंकर के भव में भी नीच गौत्र में 82 दिनों तक गर्भवास में स्थिर रहना पड़ा।

उन्होंने कहा कि अभिभान विनाश का कारण है अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। अहंकार की गति जितनी तेज होती है, उस मनुष्य का पतन उतनी ही जल्दी होता है। स्वयं को श्रेष्ठता के भाव से मुक्त करें। आलोचना से बचने की अपेक्षा स्वीकार कर सुधारने का प्रयास करें।
पद-प्रतिष्ठा, दीन-हीन छोटे-बड़े के भाव से मुक्त होना भी अनिवार्य है। जब तक असमानता का भाव बना रहेगा, अहंकार से मुक्ति भी संभव नहीं। अहंकारी व्यक्ति वास्तव में अल्पज्ञ व अनुभवहीन बना रहता है।

