ऐसा कर्म करें कि मृत्यु महोत्सव बन जाए – मुनि वीरभद्र

ऐसा कर्म करें कि मृत्यु महोत्सव बन जाए – मुनि वीरभद्र

राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ) 23 जुलाई। श्री विनय कुशल मुनि के सुशिष्य एवं 171 दिन तक उपवास का रिकॉर्ड बनाने वाले जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने आज यहां कि सम्यक दृष्टि अपनाइए और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपनी प्रसन्नता ना खोयेँ। उन्होंने कहा कि शरीर का नाश तो होना ही है किंतु आत्मा का कभी नाश नहीं होता। मृत्यु तो आनी ही है फिर इससे क्यों घबराना। सम्यक दृष्टि अपनायें और ऐसा कर्म करें कि मृत्यु महोत्सव बन जाए।
जैन बगीचे के नए हाल में आज अपने नियमित प्रवचन में मुनि वीरभद्र (विराग )जी ने कहा कि दीपक वह है जो रोशनी भी देता है और जला भी देता है। हवा का एक झोका आता है और दीपक बुझ जाता है। ठीक इसी तरह हमारे जीवन की स्थित भी है, हवा का एक झोका आता है और जीवन का दीप बुझ जाता है। सम्यक दृष्टि अपनायें और मृत्यु को महोत्सव बनाएं। उन्होंने दृष्टि के बारे में कहा कि पहली और दूसरी दृष्टि सामान्य होती है। तीसरी दृष्टि में प्रेम, वात्सल्य, सद्भाव आना शुरू हो जाता है। चौथी दृष्टि में भक्ति अर्थात अहो भाव आना शुरू हो जाता है।
मुनि श्री ने कहा कि पांचवी दृष्टि धर्म या स्थिरा दृष्टि होती है। यह वास्तविक दृष्टि होती है। इस दृष्टि वाले व्यक्ति को धर्म से कोई डिगा नहीं सकता। वह धर्म के प्रति श्रद्धावान रहता है, जिस प्रकार रत्न की चमक खत्म नहीं होती उसी प्रकार जीव में धर्म की दृष्टि सदैव बनी रहती है और वह अंतिम दृष्टि की ओर बढ़ता जाता है। इस दृष्टि में आने वाला जीव आत्ममुखी हो जाता है।
मुनि वीरभद्र(विराग ) जी ने कहा कि इस दृष्टि वाला जीव अन्य की पीड़ा को भी अपना ही पीड़ा समझता है। ऐसा जीव संसार को सुखी देखना चाहता है और इसी तरह का पुरुषार्थ करना चाहता है कि कोई दूसरा दुखी ना हो। धर्म के प्रति उसकी प्रबल इच्छा रहती है और वह समय मिलने पर आत्म कल्याण के मार्ग की ओर बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि सद्गति और दुर्गति बाह्य परिणामों की वजह से नहीं बल्कि अभ्यंतर परिणामों की वजह से होती है। उन्होंने कहा कि अपने आप को कषायों से मुक्त करें और सम्यक दृष्टि अपनाते हुए आत्म कल्याण के मार्ग की ओर बढ़ जाएं।

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