वीतराग देवों की वाणी समस्त जगत के प्राणियों के आनन्द सुख शांति देने वाली होती है- साध्वी मंजुला श्री जी

वीतराग देवों की वाणी समस्त जगत के प्राणियों के आनन्द सुख शांति देने वाली होती है- साध्वी मंजुला श्री जी

रायपुर (अमर छत्तीसगढ) 30 जुलाई। शासन दिपिका साध्वी मंजुला श्री जी निरंतर आत्मा को जागृत करने के लिये निरंतर वर्षावास चार्तुमास में जिनवाणी परमात्मा महावीर की सुना रही है धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा- हे भव्य उपासकों वीतराग देवों की वाणी समस्त जगत के प्राणियों के आनन्द सुख शांति देने वाली होती है।

हे भव्य उपासकों जीव अनंतकाल से 84 लाख योनियों से भटकता आ रहा है। एकन्द्रीय से भटकते हुए न जाने कितनी योनियों से भटकते हुए अब मनुष्य मव पांच इन्द्रिय को पाया है।

ये पांच इन्द्रियों का राजा आत्मा है। जो मन से जुड़ी रहती है। वह आत्मा ही है। व्यक्ति के अन्दर की इन्द्रिया जब सक्रीय होकर आत्मा को ज्ञान आदि से जगाने का कार्य करती है तो अन्दर का कमल खिल उठता है।

परमात्मा महावीर कह रहे है इस पवित्र आत्मा में करूणा, दया, मैत्री के बीज बोने में लगाओ। जहां आत्मा को पाप में उलझा दिया तो अनंत-अनंत जन्म-मरण करना पड़ेगा।

हे भव्य उपासकों पूर्व भव में भगवान महावीर राजा थे उन्हे संगीत सुनने का बहुत शौक था। उन्होने शय्या पालक से कहा मुझे जब नींद आए तब संगीत बंद कर देना। वह संगीत बंद करना भूल गया।

राजा जब उठे उन्होने शय्या पालक को डाट लगाई और उसके कानो में गरम-गरम शीशे डाले। ये राजा का (पूर्वभव महावीर) का अनंत कर्मों का बंध था जिसका फल जब वे भगवान महावीर बने तब कानो में कीले लगे।

जिसे उन्होने समभाव से इस कर्म को सहन किया। यह जिनवाणी हमें यही संदेश दे रही है कभी भी शुभ कर्म करें। अशुभकर्म से बचें। ये अरिहंत परमात्मा महावीर की जिनवाणी हमें यही संदेश दे रही है।

हे भव्य उपासकों- धन्ना के पिताजी तीनो बेटो को समझा-समझा कर कहा तुम लोगों की ईर्ष्या से पूरा घर और मैं परेशान हो दुखी हो गया हूं। इससे तीनो बेटे बोले पिताजी आपको शांति कैसे मिले यह हमें बताओ पिताजी ने कहा तुम लोग ही बता दो मुझे शांति कैसे मिलेगी।

तीनो ने कहा पिताजी हम जंगल में झोपड़ी बना देते है वहां शांति रहेगी। आपके भोजन आदि की हम व्यवस्था कर देंगे। पिताजी झोपड़ी में रहने लगे। एक दिन अयोध्या के राजा का घोड़ा उनकी

झोपड़ी के पास भूखा प्यासा पहुँच गया। पिताजी ने उसे पानी पिलाया और देखभाल की। अयोध्या के राजा भी वहां पहुँचते है पूछते है तुम जंगल में क्यों रहते हो? पूरी बात सुनी और कहा तुमने मेरे घोड़े की सेवा की है उपकार किया है तुम मेरे साथ महल में चलो वहां रहना। पिताजी ने कहा मै तो घर छोड़ शांति के लिये यहां आया आप महल चलने कह रहे है राजा बोले आपको महल में हम एक जगह शांति से रखेंगे आप चले दोनो साथ चलकर महल पहुंच गए। क्रमशः आगे बात जानेंगे।

Chhattisgarh