राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ़) 30 जुलाई। प्रख्यात जैन संत एवं मुनि विनय कुशल जी के सुशिष्य मुनि वीरभद्र (विराग ) जी ने कहा कि हम कोई भी क्रिया लोगों को खुश करने के लिए करते हैं किंतु परमात्मा को खुश करने के लिए कोई क्रिया नहीं करते। जब तक परमात्मा को खुश करने के लिए क्रिया नहीं करेंगे तो अपनी क्रियाओं में आनंद कहां आ पाएगा?
जैन संत श्री वीरभद्र ने कहा कि पाप का वास्तविक स्वरूप हम समझ नहीं पाए हैं। हमारी प्रवृत्ति कैसी हो, इसे भी हम समझ नहीं पाए हैं। उपसर्ग को समता के साथ सहन करना होगा तभी हम अपनी क्रियाओं का आनंद उठा पाएंगे।
मुनि श्री ने कहा कि हम व्रत तो करते हैं किंतु कुछ छूट के साथ। हमें इस दृढ़ निश्चय के साथ व्रत करना चाहिए कि चाहे जैसी परिस्थितियां आ जाए व्रत नहीं तोडूंगा। उन्होंने कहा कि तात्विक दृष्टि आ जाए तो यह संभव होगा। जब तक मन में समाधि ना हो तब तक हम अपने व्रत में टिके नहीं रह नहीं सकते।
मुनि वीरभद्र जी ने कहा कि मन के अंदर स्थिरता रहे उस परिस्थिति को समाधि कहते हैं। उन्होंने कहा कि आत्मा को कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकता, उसे नुकसान या फायदा पहुंचाना केवल अपने पास है।
धर्म के प्रति अहोभाव आ जाए तो हम जो भी क्रिया करेंगे, उसका आनंद भी प्राप्त कर पाएंगे। मुनि श्री ने कहा कि हम क्रियाएं तो कर रहे हैं किंतु उसमें आनंद नहीं है, क्योंकि हम क्रियाओं को लोगों को खुश करने के लिए करते हैं, जिस परमात्मा ने हमें सब कुछ दिया है, हम उन्हें खुश करने के लिए कुछ नहीं करते।
अपने आपको परमात्मा को समर्पित कर दें,धर्म के प्रति अहोभाव लाएं और मन को निर्मल बनाएं, तभी हम आत्म कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ पाएंगे। यह जानकारी एक विज्ञप्ति में विमल हाजरा ने दी।

