किसी भी पीड़ा को दूर करने के लिए दूसरी बड़ी पीड़ा के बारे में सोंचो-मुनि वीरभद्र

किसी भी पीड़ा को दूर करने के लिए दूसरी बड़ी पीड़ा के बारे में सोंचो-मुनि वीरभद्र

राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ़) 2 अगस्त। “किसी भी पीड़ा को दूर करने के लिए किसी दूसरी बड़ी पीड़ा के बारे में सोंचो तो वह पीड़ा अपने आप दूर हो जाएगी। हम अगर नरक की वेदना को सामने में रखें तो हमारी सारी वेदना हमें छोटी लगने लगेगी। हम अपनी वेदना को भूल जाएंगे। उक्त उद्गार जैन संत श्री वीरभद्र (विराग) जी ने आज अपने नियमित प्रवचन में वयक्त किये।
जैन बगीचे के नए हाल में प्रवचन देते हुए उन्होंने कहा कि आत्मिक सुख ही स्थाई सुख है। मानव जीवन में उतार-चढ़ाव तो आता ही रहता है, हम इससे ना घबराएं और आत्मिक सुख प्राप्ति की राह में बढ़ चले। मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि आत्मिक सुख आध्यात्म में है। हम हर क्रिया करते समय आत्म कल्याण की सोचकर क्रिया करें। भ्रांतियां अगर दिमाग में बैठ जाती है तो हम अच्छे काम को भी करने से डरने लगते हैं।
मुनि वीरभद्र (विराग )जी ने कहा कि बीमार वही है जो आत्मा को छोड़ शरीर को मजबूत बनाने में लगा रहता है। आत्मा को मजबूत करने में यदि ध्यान दिया जाए तो व्यक्ति कभी बीमार ही नहीं होगा। दुनिया में हमारे साथ जो कुछ भी होता है, वह अपने कर्मों के कारण होता है।

कोई भी व्यक्ति चाहे हमें सुखी कर सकता है या दुखी कर सकता है। दरअसल हम कठपुतली का जीवन जी रहे हैं। ऐसे कठपुतली वाला जीवन जीने से क्या फायदा? हमें स्वच्छंद और स्वाधीन जीवन जीने के लिए आध्यात्मिक कमान चाहिए ताकि हम आत्म कल्याण के मार्ग में बढ़ सके।
मुनि वीरभद्र विराग जी ने कहा कि जहां परिणाम ना मिले वहां अपने परिवार की समस्याओं या अन्य बातों को ना करें। परिवार की बात करने से लोग हमें हंसी का पात्र बनाते हैं। बच्चे बिगड़ते हैं तो इसका सारा दोष मां-बाप, दादा-दादी एवं अन्य परिजनों को जाता है

जिन्होंने बच्चों को भौतिक शिक्षा तो दी किंतु आध्यात्मिक शिक्षा नहीं दी।संस्कार देने के मामले में भी वे पीछे रहे। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय हमारे हाथ में है, इसलिए मन को निर्मल बनाएं और आत्म कल्याण के मार्ग में आगे बढ़े। यह जानकारी एक विज्ञप्ति में विमल हाजरा ने दी।

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