जैनाचार्य श्री विजयराज  ने मंगलाचरण के बाद भगवान महावीर के उत्तराध्ययन सूत्र के 31 वें अध्याय का पठन

जैनाचार्य श्री विजयराज ने मंगलाचरण के बाद भगवान महावीर के उत्तराध्ययन सूत्र के 31 वें अध्याय का पठन

-तिलक नगर के सूर्य मार्ग स्थित सामुदायिक भवन प्रवचन मंडपम् में चातुर्मासिक के प्रवचन
जयपुर (अमर छत्तीसगढ) 9 अगस्त। तिलक नगर के सूर्य मार्ग स्थित सामुदायिक भवन मंडपम् में चातुर्मास के 15 वें दिन शुक्रवार को प्रवचन में जैनाचार्य श्री विजयराज म.सा. ने मंगलाचरण के बाद भगवान महावीर के उत्तराध्ययन सूत्र के 31 वें अध्याय की दूसरी गाथा पर विवेचना करते हुए प्राणाति पाप, मृषावाद पाप, अदत्तादान पाप के बाद चौथा मैथून पाप पर कहा कि भगवान महावीर चरण विधि का उपदेश देते हुए कहते हैं कि जैन दर्शन सिर्फ असंयम से निवृति और संयम में प्रवृति की ही बात नहीं करता बल्कि तीसरी अनासक्ति की बात भी करता है।

मानव में अगर अनासक्ति का भाव रहेगा, तो वह सत् ज्ञानी, सत्य का प्रेणता और मर्यादित जीवन का निर्वाह कर सकेगा। आसक्ति पाप है, इससे दूर रहने का प्रयत्न करते रहना चाहिए।

अनासक्ति दुर्लभ है, पर सांसारिक जीवन में श्रावक-श्राविकाएं इसे कर लेते हैं तो मर्यादित, संयमित और आदर्श जीवन जी सकते हैं। इसी में नैतिकता, प्रमाणिकता और आदर्शशीलता है। जबकि आसक्ति जीव को मोक्ष की प्राप्ति से रोकता है।

कामुकता और वासना जीव को संसार में बांधता है। अनासक्ति मुक्त करती है। इसलिए आसक्ति का त्याग करना आवश्यक है। पर पुरूष और पर स्त्री का त्याग महिलाओं और पुरूषों को करना बहुत जरूरी है। स्वयं पुरूष और स्वयं स्त्री में साथ रहकर ही स्त्रियों और पुरूषों को मर्यादित रहकर आदर्श जीवन जीना चाहिए।

उन्होंने कहा कि पर स्त्री या पर पुरूष आग की ज्वाला है और स्वयं स्त्री या स्वयं पुरूष शीतल जल है। मानव जीवन में ही पांच इंद्रियों के अलावा छठा मन भी काम करती है, इसका सदुपयोग कर ही वह अच्छा जीवन जी सकता है। जबकि अन्य जीव-जन्तुओं में एक ना एक इंद्रियों की कमी रहती है। वह इसे पूरा करने में अक्षम है।

मानव जीवन में जब पुण्य का अर्जन होता है, तो वह सुखी जीवन का निर्वाह करता है। जब यह पापों के कारण डुबता है तो दुखी और कष्टमय जीवन जीता है। इसलिए व्यक्ति को हमेशा अच्छे कार्यों के जरिए पुण्य का उदय करते रहना चाहिए।

आचार्य श्री ने कहा कि समय, पीड़ा और दुख को भुलाता है, जबकि संयम पाप से मुक्त करता है। देव, दानव और गंदर्भ को सब नमस्कार करते हैं, जबकि भोगी को कोई नहीं पूछता और ना ही सम्मान देता है। इसलिए भोगी ना बने, यह रोग का कारण बनता है।

उन्होंने श्रावक-श्राविकाओं से कहा कि होटल भोग और अस्पताल रोग का स्थान है। इसलिए घर का खाना खाए और अस्पताल से दूरी बनाएं, इसमें ही आनंद की अनुभूति है। भोग का जब परिणाम आता है, तो व्यक्ति उससे छुटकारा पाने में असमर्थ हो जाता है।

उसे परिणाम को भुगतना ही पड़ता है। इसलिए भोग की क्रियाओं को त्यागकर संयम और विवेक से काम करें, तभी जीवन में सफलता का अर्जन हो सकता है। प्रवचन के मध्य में आचार्य श्री ने सहज और सरल तरीके से इन्हीं सब संदर्भों का उदाहरण देकर श्रावक-श्राविकाओं को समझाया।

उन्होंने दृष्टि दोष से मुक्त रहने के लिए भी कहा। दृष्टि दोष से स्मृति व स्वप्न दोष उत्पन्न हो जाता है। इससे हमेशा दूर रहने का प्रयास करते रहे। उन्होंने कहा कि चौथा मैथून पाप सभी पापों का निर्माण करता है। यह पापों की फैक्ट्री है, इससे दूरी बनाए रखना ही सर्वोत्तम है।

आचार्य श्री ने प्रवचन से पूर्व भजन सुनाकर प्रवचन मंडपम् को भक्तिमय बना दिया। उनके प्रवचन से पहले संत श्री विनोद मुनि म.सा. ने जैन दर्शन के विभिन्न आयामों पर प्रवचन दिए।


प्रत्याख्यानों की श्रृंखला में शुक्रवार को बियासन, एकासन, आयम्बिल, नीवीं, उपवास, बेले, तेलें आदि प्रत्याख्यानों के साथ नीतू जी ढाबरिया के 36 उपवास,कविता जी दस्साणी के 24 उपवास,पुखराज जी कोठारी के 16 वां उपवास गतिमान है।

नवरतनमल लूंकड़ के 30 उपवास के अग्रिम प्रत्याख्यान से 22 वां उपवास गतिमान है तथा चारित्र आत्माओं में साध्वी श्री लावण्य श्री जी म.सा. के 18 तथा साध्वी श्री महकप्रभा जी म.सा. के 16 उपवास की तपस्या चल रही है तथा एकासना, आयम्बिल, उपवास और तेले की लड़ी भी निरंतर जारी है।

श्रावक-श्राविकाओं सहित चारित्र आत्माओं की अन्य गुप्त तपस्याएं भी जारी है।सभी खूब उत्साह व उमंग से तप – जप करके धर्म आराधना व शासन प्रभावना में समर्पित है।धर्मसभा के अंत में संघ के महामंत्री नवीन लोढ़ा ने आचार्य भगवन् के सानिध्य का अधिकतम लाभ लेने के लिए जनसमूह को निवेदन किया एवं आह्वान किया कि जो लाभ नहीं ले पा रहे उनको प्रेरणा करें कि वो इस सौभाग्य से वंचित ना रहे।

नवकार भवन में प्रात: 6 से 6.50 बजे तक स्वयं जैनाचार्य क्लास लेकर नैतिक,व्यवहारिक एवं धार्मिक जीवन जीने की कला सिखा रहे हैं। प्रात:8.45 से 10.15 बजे प्रवचन के माध्यम से जिनवाणी करते हैं। दोपहर में 3.15 बजे महामंगलकारी मंगलपाठ होता है।

महामंत्री नवीन लोढ़ा ने बताया कि आचार्य श्री विजयराज महाराज म.सा. के सानिध्य में शुक्रवार को नीतू ढाबरिया के तपस्या की पूर्णाहुति के उपलक्ष्य में सामूहिक एकासन हुआ।

मरुधरा सिंहिनी महासती नानू कंवर म.सा. की पुण्य स्मृति में 27 जुलाई को सुबह 9.30 से दोपहर 2 बजे तक नेत्र चिकित्सा एवं लैंस प्रत्यारोपण, स्वास्थ्य चिकित्सा एवं तम्बाकू मुक्ति शिविर, कैंसर जांच जागरुकता शिविर और ब्लड डोनेशन शिविर, कपल शिविर तथा सामूहिक निवी का कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा।

धर्मसभा में कोलकाता, मुम्बई, इन्दौर, भोपाल, चित्तौड़, ताल,राजनांदगांव, उदयपुर, बीकानेर, ब्यावर, भीलवाड़ा, मंदसौर, नागौर एवं असम,पश्चिम बंगाल जैसे सुदूर प्रांतों से श्रद्धालु भक्त उपस्थित थे,सभी का आतिथ्य श्री साधुमार्गी शान्त क्रान्ति जैन संघ,जयपुर की ओर से किया गया।

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