राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ) 10अगस्त। श्री विनय कुशल मुनि के सुशिष्य एवं 171 दिन तक उपवास का रिकॉर्ड बनाने वाले जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने आज यहां कहा कि कमजोर बच्चों को जिस प्रकार ज्यादा मेहनत की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार आत्म कल्याण के मार्ग में बढ़ने के लिए हमें भी मेहनत की आवश्यकता है। नवकार मंत्र का जाप ऐसा करें कि हमारे भीतर परिवर्तन आ जाए।
जैन संत श्री वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि आत्म कल्याण के क्षेत्र में हमें आगे बढ़ना हो तो मेहनत के साथ-साथ हमें बुद्धि का भी उपयोग करना होगा। क्रोध का त्याग करना होगा।
उन्होंने कहा कि क्रोध से स्वयं को तो नुकसान होता ही है,जीव अंदर ही अंदर तड़पता है। क्रोध, अंदर से स्वयं को जला देता है। क्रोध से काम बिगड़ जाता है। गुस्सा करें और काम बन जाए तो सभी गुस्सा करते, वैसे भी 95 फ़ीसदी लोग क्रोध करते ही हैं, क्या वे सफल हो जाते हैं! यदि क्रोध करने से सफल हो जाते तो सभी क्रोध करने लग जाते।
उन्होंने कहा कि गर्म होने के कारण ही सूर्य अकेला रहता है जबकि ठंडा होने की वजह से चंद्रमा सभी तारों के साथ होता है। सूर्य गर्माहट देता है और चंद्रमा शीतलता प्रदान करती है।
श्री वीरभद्र (विराग) मुनि ने क्रोध के चार प्रकार बताएं। उन्होंने कहा कि क्रोध का पहला प्रकार पानी में लकीर खींचने जैसा है जो कुछ देर रहने के बाद चला जाता है। ज्यादा से ज्यादा इस प्रकार का क्रोध 15 दिन तक रहता है।
दूसरे प्रकार का क्रोध मिट्टी में लकीर खींचने जैसा है जो 6 माह तक रहता है। तीसरे प्रकार का क्रोध धरती के भीतर लकीर खींचने जैसा होता है जो साल भर तक रहता है। चौथे प्रकार का क्रोध पर्वत में दरार जैसा होता है जो स्थाई रहता है।
उन्होंने कहा कि परिवार वह होता है जहां हर वयक्ति कर्तव्य भावना का बोध करता हो। संवेदनाएं नहीं होने के कारण सारी क्रियाएं जड़ हो जाती है। उन्होंने कहा कि हम सभी को धर्म से जोड़ते चलें। यह जानकारी एक व्यक्ति में विमल हाजरा ने दी।

