राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ) 16अगस्त। श्री विनय कुशल मुनि के सुशिष्य एवं 171 दिन तक उपवास का रिकॉर्ड बनाने वाले जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने आज यहां कहा कि जहां इच्छाओं की समाप्ति होती, वहीं से तप शुरू होता है। शरीर के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण कोई वस्तु है तो वह है आहार। जो व्यक्ति आहार जैसी वस्तु को छोड़ दे तो फिर दुनिया की सारी वस्तुएं उसके लिए गौण है।
मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि तप करने वाला व्यक्ति कम से कम आहार का उपयोग करता है। यदि आपकी भूख चार रोटी की है और आप तीन रोटी खा रहे हैं तो आप द्रव्य कम कर रहे हैं। लेकिन व्यक्ति परिस्थितियों के अनुकूल होते ही चार की जगह पांच रोटी खाना चालू कर देता है। सारे सेंसर जीभ में होते हैं। रोटी और सब्जी को मिलाकर खाने के बाद भी वह दोनों के सवाद बता देता है। पेट भरने के लिए खाते तो आहार की विकृतियां दिखती ही नहीं। जितने कम द्रव्यों से काम चले, उतने से काम चलाएं।
मुनि श्री वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि हम द्रव्यों का मोह छोड़ नहीं पाते। इसका कारण यह है कि हम द्रव्य के प्रति आकर्षित रहते हैं। तप करें, राग नहीं टूटे तो वह तप,तप नहीं होता। कुछ ऐसी आराधना करें जिसे स्वयं को आनंद आवे। तप करने के बाद भी यदि क्रोध आ रहा है तो वह तप का मतलब नहीं समझ रहा।
उन्होंने कहा कि अपनी क्रियाएं आत्म रंजन के लिए नहीं बल्कि लोक रंजन के लिए होती है। हमें आत्म रंजन के लिए भी क्रियाएं करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जैसी भी परिस्थितियां हो आप सामान्य रहें।
मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि अंदर की क्रूरता को, पशुता के भाव को खत्म करना हो तो यही वह भव है जहां सब संभव है। वायुतप -अभ्यंकर तप दोनों साथ में होंगे तभी आत्म कल्याण के मार्ग में जीव आगे बढ़ पाएगा।यह जानकारी एक विज्ञप्ति में विमल हाज़रा ने दी।

