अहिंसा जैन धर्म की विशिष्ट पहचान, प्राणी मात्र की रक्षा का करें संकल्प- मुकेशमुनिजी… हर प्रकार की हिंसा से रहे दूर, अहिंसा हमारे जीवन का आधार- हरीशमुनिजी

अहिंसा जैन धर्म की विशिष्ट पहचान, प्राणी मात्र की रक्षा का करें संकल्प- मुकेशमुनिजी… हर प्रकार की हिंसा से रहे दूर, अहिंसा हमारे जीवन का आधार- हरीशमुनिजी

पूना महाराष्ट्र (अमर छत्तीसगढ़), 20 अगस्त। पर्वाधिराज पर्युषण के ये आठ दिन हमे अहिंसा की पालना करने के साथ अपनी आत्मा की शुद्धि के लिए तप त्याग, स्वाध्याय व साधना करने की भी प्रेरणा देते है। परमात्मा प्रभु भगवान महावीर स्वामी की इस जगत में पहचान उनके पंच महाव्रत से भी होती है जिनमें अहिंसा भी शुमार है।

अहिंसा जैन धर्म का मुख्य आधार व उसकी विशिष्ट पहचान है। ये धर्म ऐसा है जो हर तरह के जीव की रक्षा की प्रेरणा प्रदान करता है।

ये विचार पूज्य दादा गुरूदेव मरूधर केसरी मिश्रीमलजी म.सा., लोकमान्य संत, शेरे राजस्थान, वरिष्ठ प्रवर्तक पूज्य गुरूदेव श्रीरूपचंदजी म.सा. के शिष्य, मरूधरा भूषण, शासन गौरव, प्रवर्तक पूज्य गुरूदेव श्री सुकन मुनिजी म.सा. के आज्ञानुवर्ती युवा तपस्वी श्री मुकेश मुनिजी म.सा. ने श्रीवर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ,बिबवेवाड़ी पूना के तत्वावधान में पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व की आठ दिवसीय आराधना के पहले दिन बुधवार को प्रवचन में व्यक्त किए। पर्युषण का पहला दिन प्रेम एवं शांति का प्रतीक अहिंसा दिवस के रूप में मनाया गया।

धर्मसभा में पूना महानगर के विभिन्न क्षेत्रों से श्रावक-श्राविकाएं शास्त्र एवं प्रवचन श्रवण करने पहुंचे। प्रवचन में शुरू में अंतगढ़ सूत्र का वांचन मधुर व्याख्यानी हितेशमुनिजी म.सा. ने किया।

दोपहर में प्रार्थनार्थी सचिनमुनिजी म.सा. ने कल्पसूत्र का वांचन किया। दोपहर में जय आनंद प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। शाम को प्रतिक्रमण का आयोजन किया गया।

धर्मसभा में मुकेशमुनिजी म.सा. ने कहा कि पर्युषण 90 महान आत्माओं के सिद्ध होने का उत्सव है। सभी ये संकल्प ले कि पर्युषण के आठ दिन हमारा सारा समय धर्म-आराधना ओर तप-त्याग में समर्पित होना चाहिए। हमे स्वयं भी जुड़ना है ओर स्वधर्मी बंधुओं को जुड़ने की प्रेरणा भी देना है।

धर्मसभा में सेवा रत्न हरीशमुनिजी म.सा. ने कहा किपर्युषण पर्व में हमे संकल्प लेना होगा कि मन, वचन व काया से किसी प्रकार की हिंसा नहीं करेंगे। हम अपने जीवन में अहिंसा का महत्व समझ गए तो आत्मकल्याण की राह आसान हो जाएगी।

पर्वाधिराज पर्युषण हमे तपस्या, स्वाध्याय व साधना से जुड़ने का सुनहरा अवसर प्रदान करते है। इसके माध्यम से हम आत्मकल्याण की राह पर सफलतापूर्वक आगे बढ़ सकते है।

उन्होंने कहा कि अहिंसा हमारे जीवन का आधार होना चाहिए। पर्युषण पर्व हमारे लिए तब सार्थक हो जाएगा जब हम प्रकार की हिंसा से दूर हो जाएंगे। जैन धर्म का सबसे प्रमुख सिद्धांत ही अहिंसा परमो धर्म है।

दुनिया का कोई भी धर्म हिंसा करने की सीख नहीं देता सभी अहिंसा में विश्वास रखने की बात करते है। धर्मसभा में युवा रत्न श्री नानेश मुनिजी म.सा. ने कहा कि पर्युषण का पहला दिन अहिंसा दिवस हमे प्रेरणा देता है कि किसी भी प्रकार की हिंसा से स्वयं को दूर रखना है।

हम एकन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय जीवों तक की रक्षा करने का भाव रखना चाहिए। प्राणी मात्र की रक्षा करने पर ही हम सच्चे श्रावक-श्राविका बन पाएंगे। हमारे मन के भावों को भी हिंसा मुक्त रखना होगा।

पर्युषण पर्व में जिनवाणी श्रवण के साथ धर्म आराधना कर हम अपनी आत्मा को पावन व निर्मल बना सकते है। धर्मसभा में प्रज्ञा रत्न श्री हितेश मुनिजी म.सा. ने कहा कि किसी भी प्रकार की हिंसा का त्याग ही अहिंसा है।

हिंसा तीन प्रकार की मन, वचन व कर्म से हो सकती है। हमे हर प्रकार की छोटी से छोटी हिंसा का भी त्याग करना है। बिना हिंसा का त्याग किए हमारी पर्युषण पर्व की आराधना सार्थक नहीं हो सकती। धर्मसभा में प्रार्थनार्थी सचिनमुनिजी म.सा. ने कहा कि पर्युषण का आठ दिवसीय महापर्व आत्मशुद्धि करने की प्रेरणा देते है।

अष्ट कर्मो को क्षय करने की प्रेरणा भी इससे मिलती है। इन आठ दिवस में अंतकृत दशा सूत्र का वाचन भी चलता है। यह दशा उस स्थिति को कहते है जिसमें कर्म अवशेष नहीं रहते ओर जीवात्मा राग-द्वेष से मुक्त हो जाती है।

उन्होंने कहा कि आत्मा का कल्याण करना है तो बाहरी शत्रुओं से ज्यादा महत्वपूर्ण आंतरिक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करना है। ये कार्य कठिन अवश्य है पर असंभव नहीं है। इससे ही हमारी आत्मा पावन व पवित्र हो सकती है।

पर्युषण के पहले दिन कई श्रावक-श्राविकाओं ने उपवास, आयम्बिल व एकासन के प्रत्याख्यान लिए। पर्युषण पर्व के दूसरे दिन 21 अगस्त को सच्चाई की राह पर चलने का संकल्प लेते हुए सत्य दिवस मनाया जाएगा एवं दोपहर में संसद प्रतियोगिता होगी।

अंतगढ़ दशांग सूत्र कथा एवं कल्प सूत्र का वाचन

धर्मसभा में प्रज्ञा रत्न हितेशमुनिजी म.सा. द्वारा अंतगढ़ दशांग सूत्र के मूल पाठ का वाचन एवं विवेचन किया गया। उन्होंने कहा कि आर्य सुधर्मास्वामी से उनके शिष्य आर्य जम्बूस्वामी पूछते है कि आठवें अंग सूत्र में परमात्मा प्रभु महावीर ने क्या फरमाया ओर किस विषय का प्रतिपादन किया।

उस समय सुधर्मास्वामी ने अपने मुखारबिंद से जो फरमाया वही अंतगढ़ दशांग सूत्र के अंदर है। इस आठवें अंग में प्रभु महावीर ने आठ वर्ग का प्रतिपादन किया जिनमें 90 चैप्टर है। प्रत्येक चैप्टर में एक-एक अंतकृत केवली (सिद्धात्मा) का वर्णन है।

पहले वर्ग के 10 चैप्टर में से प्रथम चैप्टर गौतमकुमार का वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि किस तरह गौतमकुमार के मन में वैराग्य भाव जागृत होता है ओर वह संयम जीवन स्वीकार कर लेते है। वह 12 वर्ष दीक्षा पर्याय की पालना करने के बाद एक माह संलेखना संथारे के साथ शत्रुंजय पर्वत पर उनकी आत्मा सिद्ध बुद्ध मुक्त को प्राप्त होती है।

इसी प्रकार आगे बाकी के 9 कुमारों के भी वर्णन आते है जो गौतमकुमार की तरह दीक्षित होकर तपस्या करते है ओर सारे कर्मो को खत्म कर सिद्ध बुद्ध मुक्त होते है।

दूसरे वर्ग में आठ अध्ययन के बारे में बताया गया। किस तरह 8 राजकुमार नेमीनाथ भगवान के चरणों में समर्पित होकर त्याग-तपस्या से सभी कर्मो का क्षय कर सिद्ध प्रभु की परिषदा में सम्मिलित हो गए।

दोपहर में प्रार्थनार्थी सचिनमुनिजी म.सा. द्वारा कल्पसूत्र का वांचन किया गया। इसके माध्यम से पहले दिन बताया गया कि कल्पसूत्र वांचन में किन बातों का समावेश है एवं श्रावक-श्राविकाओं के जीवन में इसके श्रवण का क्या महत्व है।

श्रीसंघ सम्पर्क सूत्र-
श्री पोपटलालजी ओस्तवाल, अध्यक्ष
मो. 9823081825
श्री माणिकचंदजी दुग्गड़, उपाध्यक्ष
मो. 9890940941
श्री गणेशलाल ओसवाल,महामंत्री
मो. 9921879613

श्रीवर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ,बिबवेवाड़ी पूना

प्रस्तुतिः अरिहन्त मीडिया एंड कम्युनिकेशन, भीलवाड़ा,

Chhattisgarh