पर्वधिराज पर्युषण महापर्व का तीसरा दिवस मैत्री दिवस के साथ हर्षोल्लास से मनाया…. जैसे होंगे मित्र वैसे होगा चरित्र – सुकन मुनि

पर्वधिराज पर्युषण महापर्व का तीसरा दिवस मैत्री दिवस के साथ हर्षोल्लास से मनाया…. जैसे होंगे मित्र वैसे होगा चरित्र – सुकन मुनि

पुष्कर राजस्थान (अमर छत्तीसगढ़) 22 अगस्त।
(प्रकाश जैन) श्री मरुधर केसरी रूप सुकन चातुर्मास समिति एवं श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में श्री मरुधर केसरी पारमार्थिक संस्थान के प्रांगण में आयोजित महापर्व पर्युषण के तीसरे दिन में धर्म सभा में जैन श्रमण संघ के प्रवर्तक सुकन मुनि जी महाराज ने कहा कि दूसरों के हित की चिन्ता करना, दूसरों के लिए मंगल कामना करना मैत्री है।


भगवान पार्श्वनाथ ने सदा ही कमठ का हितचिन्तन किया, यह उनका आदर्श मैत्री भाव है। यह सोचना और तर्क करना बिल्कुल बेइमानी है कि दुष्टों, क्रूर पुरुषों और समाजविरोधी तत्वों के साथ मैत्रीभाव नहीं रखना चाहिए। जो हमारे साथ अपकार करें, विरोध का भाव रखें, हमारी बुराई करें, व्यर्थ की आलोचना करें, ईर्ष्या रखें- उनके साथ मैत्रीभाव कैसे रखा जा सकता है ? यदि आप ऐसा सोचते हैं तो आप बहुत बड़े भ्रम में है । आप विचार करिये, यदि ऐसे लोगों के साथ मैत्रीभाव नहीं रखेंगे तो क्या द्वेष करेंगे ? इस द्वेष भावना से किसकी हानि होगी ? आपकी ही न? तो अपनी हानि करना तो स्वयं अपने से ही द्वेष करना होगा। फिर मैत्रीभाव कहाँ रहा ? इसके अतिरिक्त वे लोग आपके द्वेष करने से सुधर तो नहीं जायेंगे । हाँ, यह अवश्य सम्भव है कि यदि आप उनकी कल्याण कामना और हितचिन्तन करेंगे तो उनमें भी परिवर्तन हो जाय और वे भी सुधर जायें ।

मैत्री भाव से शत्रुता मिट जाती है – अमृत मुनि
उपप्रवर्तक अमृत मुनि जी महाराज ने कहा कि हमारे विचारों का सामने वाले पर वैसा ही प्रभाव पड़ता है जैसा कि कैमरे के सामने आने पर हमारा प्रतिबिम्ब उसके लेन्स में पड़ता है। इसीलिए यदि हम सभी के प्रति मैत्री भाव रखेंगे तो दूसरे लोग भी हमारे प्रति मैत्री का भाव ही रखेंगे।

श्रमण संघ उप प्रवर्तक संत श्री ने भयानक और क्रूर एवं हिंसक जीवों से भरे वनों में निर्भय होकर तपस्या करते हैं, उसका एक मात्र कारण उसका मैत्रीभाव ही तो है। वे सिंह व्याघ्र आदि हिंसक पशुओं के प्रति भी मैत्री भाव रखते हैं तो वे हिंसक पशु भी उनके लिए गाय के समान सीधे और सरल बन जाते हैं।
मैत्री भाव से अपार लाभ ही है
तपस्वी रत्न श्री ने कहा कि मैत्रीभाव से लाभ ही लाभ है, अपरिमित लाभ है, किन्तु न तो इसमें किसी प्रकार की हानि है और न ही किसी प्रकार व्यय है। लाभ यह है कि संसार के सभी प्राणी अपने मित्र हो जाते हैं, अपना लोक परलोक बनता है, सर्वत्र अभय का वातावरण बनता है, क्योंकि मित्र से कभी भय नहीं होता ।

मैत्री के दीप जलाए -महेशमुनि
इस अवसर पर महेश मुनि महाराज मैत्री के दीप जलाओ गीत की भावभीनी प्रस्तुति से मैत्री भाव में जीने की प्रेरणा दी। उनकी भावपूर्ण प्रस्तुति से समूचा क्षेत्र अध्यात्म एवम धर्म मय हों गया । डॉ वरुण मुनि के अंतगढ़ सूत्र वाचन को श्रवण कर पुलकित हुए श्रद्धालु डॉ वरुण मुनि महाराज ने अंतगड़ सूत्र के माध्यम से श्री कृष्ण के भाई गजसुकुमाल मुनि का सजीव चित्रण किया।

श्रद्धालु श्रावक श्राविकाएं
अंतगढ़ सूत्र का वाचन सुन खूब अभिभूत एवं पुलकित हुए। अखिलेश मुनि महाराज ने कल्प सूत्र द्वारा स्वप्न के प्रकारों का विवेचन किया।


त्याग तप का लगा अनुपम ठाठ
पर्वधिराज महापर्व पर्युषण के दौरान श्रद्धालु श्रावक श्राविकाओं में तप त्याग,जप जाप,धर्म ध्यान व साधना आराधना करने में जबरदस्त होड़ लगी हुई है। श्रद्धालु तपस्या से अपनी आत्मा को कुंदन बनाने में लगे हुए हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु श्रावक श्राविकाओं का कस्बे में आने का सिलसिला अनवरत जारी है।

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