निस्वार्थ सेवार्थी हर जगह सम्मान पाता है- सुकन मुनि… सेवा ही सबसे बड़ा धर्म – मुनि अमृत

निस्वार्थ सेवार्थी हर जगह सम्मान पाता है- सुकन मुनि… सेवा ही सबसे बड़ा धर्म – मुनि अमृत

पुष्कर राजस्थान (अमर छत्तीसगढ),24 अगस्त
श्री मरुधर केसरी रूप सुकन चातुर्मास समिति एवं श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में श्री मरुधर केसरी पारमार्थिक संस्थान में आयोजित महापर्व पर्युषण के पांचवे दिन धर्म सभा में श्रमण संघ के प्रवर्तक सुकन मुनि महाराज ने कहा कि सेवा मानव की ऐसी सर्वोत्तम भावना है, जो मानव को सच्चा एवम महान मानव बनाती है।
जैन प्रवर्तक श्री ने कहा कि मानवता के प्रति प्रेम को किसी देश, जाति या धर्म की संकुचित परिधि में नहीं बांधा जा सकता। जिस व्यक्ति के मन में ममता, करुणा की भावना हो, वह अपना समस्त जीवन मानव सेवा में अर्पित कर देता है। ठीक इसी भाव से हम सबको अपना जीवन समाज हित में आगे बढ़ाना चाहिए।

सेवा धर्म धरती का सबसे बड़ा धर्म है,हम धर्म के मर्म को समझे – अमृत मुनि
उपप्रवर्तक अमृत मुनि महाराज ने अपनी देशना mr कहा कि सेवा भाव मनुष्यों के साथ ही पेड़-पौधों व जीव-जंतुओं के प्रति रखते हुए हम इसे वृहद स्तर पर जनोपयोगी बना सकते हैं। सेवा भाव अतुलनीय संपदा है जिसे लगातार संचित करना हम सभी की नैतिक एवं सामाजिक जिम्मेदारी है। जीवन का मूलमंत्र दूसरों के प्रति नि:स्वार्थ सेवा भाव रखना है।


सेवा भावना हेतु इंसान का विनम्र होना नितांत जरूरी-तपस्वीराज संत सेवा भाव के लिए विनम्रता व सहनशीलता सबसे बड़ा गुण होता है। सहनशील व विनम्र हुए बिना हम सेवा भाव को अपने जीवन व आचरण में विकसित नहीं कर सकते। सेवा भाव से परिपूर्ण होकर ही हम अन्य लोगों के सामने मिसाल कामय कर सकते हैं।

जिससे पूरे समाज को उत्थान व तरक्की के मार्ग पर सामूहिक रूप से आगे बढ़ाया जा सके। सेवा व्यवहार ही मनुष्य की पहचान बनाता है और उसकी नि:स्वार्थ भावना को चमकाता है।

हम सभी महान कार्य तो नहीं कर सकते लेकिन नि:स्वार्थ सेवा कर अपने समाज व परिवार का नाम जरूर रोशन कर सकते हैं। हम सभी को निस्वार्थ भाव से जीवन को जीने की कला अपने भीतर विकसित करनी चाहिए।


समाज हित में सतत सेवा कार्य करें =महेश मुनि
संत महेश मुनि महाराज ने कहा कि निस्वार्थ भाव रखते हुए समाज हित में लगातार कार्य करना ही मानव जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
अंतगढ़ सूत्र वाचन में श्रद्धा झलकी
इस अवसर पर डॉ वरुण मुनि ने अंतगड़ सूत्र के पंचम वर्ग में श्रीकृष्ण महाराज की आठ पटरानियों के दीक्षा लेने का वर्णन किया तो वही अखिलेश मुनि ने कल्प सूत्र के माध्यम से भगवान महावीर के बाल्यावस्था का वर्णन किया।
संघ अध्यक्ष समाज सेवी श्री संपत राज कोठारी ने बताया कि जैन संतो के दिव्य दर्शनों एवम प्रयुषण पर्व में संत समागम के साक्षी बनने हेतु देश के अनेक भागों से संघ के राष्ट्रीय प्रमुख्रो के अलावा श्रद्धालुओं की पुष्कर में आवाजाही सतत बनी हुई है। श्रद्धालु श्रावक श्राविकाएं सामायिक साधना एवम जप तप से अपनी आत्मा को कुंदन बनाने में पूरी श्रद्धा भक्ति एवम समर्पण भावों से जूट कर इस अनमोल जीवन को सफल बना रहें है।

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