राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ) 31 अगस्त। श्री विनय कुशल मुनि के सुशिष्य एवं 171 दिन तक उपवास का रिकॉर्ड बनाने वाले जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने आज यहां कहा कि आराधना छोटी या बड़ी नहीं होती, आराधना तो आराधना होती है मगर महत्व यह भी रखता है कि उसका भाव कैसा है। उन्होंने कहा कि तपस्या करना बड़ी बात नहीं है किंतु तपस्या के लिए मन:स्थिति होनी चाहिए।

जैन बगीचे स्थित उपाश्रय भवन में मुनि श्री वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि जैन समाज में तप,अहिंसा और संयम का बहुत बड़ा महत्व है। उन्होंने कहा कि तप की महिमा का क्या बखान करें,तप हमें संयम सिखाता है। उन्होंने कहा कि राग को पालना आसान है, किंतु उसका त्याग मुश्किल है। राग अर्थात मोह के त्याग के लिए तप ही हमारा बड़ा सहयोगी होता है। उन्होंने कहा कि जब तक एक दूसरे के सहयोगी बनकर काम नहीं करेंगे तब तक काम आगे नहीं बढ़ता। ठीक इसी तरह राग का त्याग करने के लिए हमें तप का सहयोग लेना पड़ेगा।तप के जरिए ही राग का त्याग किया जा सकता है।
जैन मुनि श्री वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि आराधना छोटा या बड़ा नहीं होता, बस इसका भाव देखना होता है। तपस्या करना बड़ी बात नहीं है किंतु इसके लिए मन:स्थिति होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि तप ऐसा कीजिए कि तप अमृत उत्सव बन जाए। हमें जो मौका मिला है उसका आराधना करके लाभ उठा लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि मोक्ष का सबसे बड़ा दुश्मन कोई है तो वह शरीर ही है और इसके बिना हम मोक्ष भी नहीं पा सकते। आराधना करना है तो इच्छाओं को मारना होगा तभी हमारी आराधना सफल हो सकती है। उन्होंने कहा कि हमको इस शरीर से काम निकालना है। इसलिए इसके माध्यम से तप कर आत्म कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर लें। यह जानकारी एक विज्ञप्ति में विमल हाजरा ने दी।

