बिलासपुर(अमर छत्तीसगढ) 13 सितंबर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महासमुंद जिले के एक युवक 2005 में दर्ज दुष्कर्म और धमकी के मामले में सुनाई गई सजा से बरी कर दिया। न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत की एकलपीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपित की दोषसिद्धि को संदेह से परे सिद्ध नहीं कर सका। इसलिए उसे संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त किया जाता है।
कोर्ट ने पाया कि पीड़िता की गवाही में गंभीर विरोधाभास हैं. एफआईआर में कई बार दुष्कर्म का आरोप थे। जबकि अदालत में केवल एक घटना का उल्लेख है। मेडिकल रिपोर्ट में न तो गर्भपात के निशान मिले और न ऐसा प्रमाण कि गर्भधारण कथित कृत्य का परिणाम था।
रिपोर्ट सात महीने देर से दर्ज हुई और इसका कोई संतोषजनक कारण नहीं दिया गया। सआरोपित और पीड़िता के पिता के बीच पुरानी दुश्मनी भी सामने आई। इन्हें देखते हुए अदालत ने कहा कि संदेह का लाभ आरोपित को मिलना चाहिए।
यह है पूरा मामला
पुलिस रिकार्ड के अनुसार, बसना थानाक्षेत्र की 18 वर्षीय युवती, जो बचपन से दोनों पैरों से पोलियो पीड़ित है, अपने घर में अकेली थी। जनवरी 2005 से लगभग छह महीने पहले करिया उर्फ मालसिंह बिझवार उसके घर में घुसा और उसके साथ दुष्कर्म किया और धमकाया कि किसी को बताने पर जान से मार देगा।
युवती ने आरोप लगाया कि इसके बाद जब भी वह अकेली होती, आरोपित बार-बार जबरन यौन शोषण करता रहा, जिससे वह गर्भवती हो गई। घटना के लगभग सात महीने बाद 10 जनवरी 2005 को पीड़िता ने अपने पिता को जानकारी दी और फिर लिखित शिकायत पुलिस स्टेशन बसना में दर्ज कराई।
आरोपित युवक करिया उर्फ माल सिंह को धारा 376 और 506-बी दोनों आरोपों से बरी किया गया। उसकी जमानत की शर्तें भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 481 के तहत छह महीने तक प्रभावी रहेंगी. ट्रायल कोर्ट का 9 सितम्बर 2005 का दोषसिद्धि आदेश निरस्त कर दिया गया।
ट्रायल कोर्ट ने दिया था यह फैसला
डॉक्टर ने जांच में पीड़िता को करीब 20 सप्ताह (लगभग 5 महीने) का गर्भवती पाया। आरोपित की भी मेडिकल जांच हुई और उसे यौन संबंध बनाने में सक्षम बताया गया। प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश महासमुंद ने 9 सितम्बर 2005 को आरोपित युवक करिया को घारा 376 (दुष्कर्म) में 7 साल सश्रम कारावास और 500 रुपये जुर्माना और धारा 506-बी में 3 साल सजा सुनाई।

