राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ)17 सितंबर।श्री विनय कुशल मुनि के सुशिष्य एवं 171 दिन तक उपवास का रिकॉर्ड बनाने वाले जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने आज यहां कहा कि ममत्व भाव के कारण अनंत काल की साधना आराधना में कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है। हमने मेहनत बहुत की परंतु सफलता नहीं मिली। एक बार आत्मा जागृत हो जाए तो सफलता अवश्य मिलेगी।
जैन बगीचे के उपाश्रय भवन में आज मुनि वीरभद्र (विराग) ज़ी ने कहा कि मेहनत यदि गलत दिशा में की जाए तो सफलता कैसे मिलेगी? उन्होंने कहा कि हमें तरह-तरह के रोग घेरे हुए हैं, फिर भी हम इस शरीर को “मेरा” मान लेते हैं और हम उसी के आसपास घूमते रहते हैं।
उन्होंने कहा कि वास्तविक में “मेरा” कुछ नहीं है यहां तक कि “मेरा” शरीर भी मेरा नहीं है। एक कुत्ते को भी रोटी खिलाई जाती है तो वह हमारे प्रति वफादार हो जाता है किन्तु यह शरीर कभी वफादार नहीं हो सकता।
मुनि श्री वीरभद्र (विराग) ज़ी ने कहा कि बहुत ज्यादा धन नहीं चाहिए ज्यादा धन भी पाप का कारण बनता है। हम नश्वर संसार के लिए भाग रहे हैं, वास्तव में जिसके पीछे भागना चाहिए हम उसकी ओर ध्यान ही नहीं दे रहे।
हमारे भीतर हर पल समाधि का भाव, होना चाहिए। समाधि भाव होने से मन में प्रसन्नता रहेगी। यदि मोक्ष मार्ग में जाना है तो जीव को अपना अकाउंट क्लीयर करना ही होगा।
मुनि वीरभद्र (विराग) ज़ी ने कहा कि भविष्य को अच्छा बनाना है तो वर्तमान को अच्छा बनाना होगा। वर्तमान में मुझे मेरे भीतर गलतियां दिख रही है जिसे मुझे सुधारना होगा। उन्होंने कहा जब तक कर्म है तब तक क्षति नहीं होगी।
हमें तत्वों को गहराई से समझ कर आगे बढ़ना होगा। हमने अपेक्षाएं बहुत रखी हुई है,कब परिस्थिति बदल जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। हम आत्मा को जागृत करने का प्रयास करें और ज्ञान प्राप्त करें उसके बाद ज्ञान को आत्मा से कनेक्ट करने की कोशिश करें। यह जानकारी एक विज्ञप्ति में विमल हाजरा ने दी।

