भव बदलता है भाव नहीं बदलता – मुनि वीरभद्र

भव बदलता है भाव नहीं बदलता – मुनि वीरभद्र

राजनांदगांव(अमर छत्तीसगढ़) 18 सितंबर।श्री विनय कुशल मुनि के सुशिष्य एवं 171 दिन तक उपवास का रिकॉर्ड बनाने वाले जैन मुनि वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि हम अब तक अनेक जन्म ले चुके हैं। हम सभी कोई न कोई संबंध में पहले रह चुके हैं।आज हम जिसे चाचा कह रहे हैं हो सकता है कि वह पिछले जन्म का हमारा फूफा या मामा रहा हो। उन्होंने कहा कि भव बदला है भाव नहीं बदले हैँ।


जैन बगीचे के उपाश्रय भवन में मुनि श्री वीरभद्र(विराग)जी ने कहा कि भीतर जब कुछ प्रवेश हो जाता है तो व्यक्ति अपने आपे में नहीं रहता। कषायों( काम, क्रोध, मोह और लोभ) को भीतर प्रवेश करने ना दो और यदि प्रवेश कर गया है तो इसे हावी न होने दो। हालांकि काम, क्रोध, लोभ का भूत सबके अंदर है, फिर भी इसे हावी न होने दो। हो सके तो इसे अपने भीतर से बाहर निकाल दो और सुख व शांति की जिंदगी व्यतीत करते हुए साधना करो।

काम, क्रोध, लोभ आदि जीवन को भटकाने वाले हैं। मन में वीतराग लाओ। वीतराग आने से राग द्वेष खत्म हो जाते हैं। वीतराग अंदर हो तो राग – द्वेष स्वमेव ही बाहर हो जाएंगे।
मुनि श्री वीरभद्र (विराग) जी ने कहा कि चाहे कितनी प्रतिकूलता हो बस इन प्रतिकूल परिस्थितियों को पार कर हमें आगे बढ़ना है। रोग का राग बहुत खतरनाक होता है। इससे दूर रहो और बच्चों को संस्कार दो। एक बार संस्कार अंदर रच बस जाए तो फिर वह संस्कार इतनी आसानी से हटाया नहीं जा सकता। यह जानकारी एक विज्ञप्ति में विमल हाज़रा ने दी।

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