जन्म दिवस पर विशेष… संयम सुमेरु, प्रवचन प्रभाकर जैनाचार्य श्री विजयराज का देदीप्यमान व्यक्तित्व… सरल, सहज, सौम्य, सहिष्णु, अनन्त गुणों की खान, अष्ट सम्पदा और छत्तीस गुणों के धनी हैं जैनाचार्य

जन्म दिवस पर विशेष… संयम सुमेरु, प्रवचन प्रभाकर जैनाचार्य श्री विजयराज का देदीप्यमान व्यक्तित्व… सरल, सहज, सौम्य, सहिष्णु, अनन्त गुणों की खान, अष्ट सम्पदा और छत्तीस गुणों के धनी हैं जैनाचार्य


ब्यावर राजस्थान (अमर छत्तीसगढ़) 25 सितंबर।
(प्रकाश जैन)
जैन जगत में आचार्य परम्परा के यशस्वी, तपस्वी, महामनस्वी, महातपोधन जैनाचार्य श्री हुक्मीचंद जी म.सा. के पुनीत गच्छ-सम्प्रदाय के अष्टम पट्टधर समता विभूति, समीक्षण ध्यान योगी आचार्य प्रवर पूज्य श्री नानालाल जी म.सा. के अंतेवासी सुशिष्य जैनचार्य भगवन् श्री विजयराज जी म.सा. को जन्म दिवस पर हार्दिक बधाई।
आपका आर्शीवाद सदैव हम पर बना रहे – ऐसी हमारी मनोकामनाएं है।

आचार्य श्री अप्रतिम विशिष्ट व्यक्तित्व के धनी हैं, जो आचार्य की अष्ट सम्पदा और छत्तीस गुणों के धारक हैं। आपके व्यक्तित्व की जितनी तारीफ या प्रशंसा की जाए लेखन से उतनी कम ही पड़ेगी। जैनाचार्य प्रवर मानवीय मूल्यों की गरिमा के गायक,उन्नायक और सार्वभौम सामंजस्य के संवाहक हैं।

इनकी लेखनी में लोक मंगल, वाणी में विश्व बंधुत्व, विचारों में वसुधैव कुटुम्बकम्, सांसों मे समन्वय, दिल में दया और आत्मा में अध्यात्म का अंतर्नाद समाया हुआ है।

जैनचार्य श्री कवि के रूप में परमात्म प्रेम के प्रवक्ता, भक्त के रूप में कुरीतियों के भंजक, चारित्र निर्माण के रूप में चिंतनशील, समाज सुधार के समर्थक, सृजनशीलता के सम्पोषक, धर्म व नैतिकता के उद्‌घोषक और दार्शनिक के रूप में सत्यं शिवं सुंदरम् के आराधक हैं।

उनकी निर्लिप्तता की इस भावना के उदय से ही हर व्यक्ति को आपसे अनन्य आत्मीयता की अनुभूति होती है। आपके पवित्र प्रेम व निश्छल व्यवहार में अनेक मुनि महात्माओं की छवि परिलक्षित होती है।

कोई आपको ज्योतिधर श्री जवाहराचार्य के रूप में तो कोई जैन दिवाकर के रूप में कोई आचार्य तुलसी के रूप में तो कोई आचार्य श्री हीराचंद्र तो कोई मुनि रूप रजत के रूप में निहार कर आनंदित व प्रसन्न होते हैं।

धर्म श्रद्धालु जैनाचार्य श्री विजयराज म.सा. के बिम्ब में अपने अपने गुरु का प्रतिबिम्ब देखते हैं।
2002 में ब्यावर में संयम सुमेरु से अलंकृत किया…
आप सामंजस्य के संदेश वाहक है, इसलिए ही अन्य सम्प्रदायों मनीषी साधु-संतों व श्रावकों के आप हमेशा चहेते रहे है।

नानेश पट्टधर जैनाचार्य श्री की काफी सारी विशेषताओं कारण ही वर्ष, 2002 में ब्यावर की आठ सम्प्रदायों के श्रावकों ने आपकी संयम प्रियता व संयम निष्ठा को देखकर संयम सुमेरु अलंकरण प्रदान किया।
चितौड़गढ़ में विश्व वल्लभ से सुशोभित किया, कर्नाटक में चिंतामणि की उपाधि दी..
वहीं वर्ष, 2005 में चितौड़गढ़ के सकल जैन समाज ने आपकी जन प्रियता को देखकर के विश्ववल्लभ का विशेषण प्रदान किया।

वर्ष, 2010 में कर्नाटक होसपेट चातुर्मास में जैन समाज के चारों समुदायों ने मिलकर आपका वर्षावास करवाया और इसी चातुर्मास में चारों मूर्तिपूजक, दिगम्बर, तेरापंथी व स्थानकवासी समाज ने संयुक्त रूप से आपको वाक् चिंतामणी की उपाधि प्रदान की।

आप कभी भी पद-प्रतिष्ठा के इच्छुक नहीं रहे हैं। आपका निस्पृह जीवन अध्यात्म की भाव भूमि को स्पर्श कर चुका है। आचार्य श्री सारे विशेषणों और पदों से परे अपनी साधना की अल्हड़ मस्ती में जीते हैं।

छोटी उम्र में हो गए संसारी जीवन से विरक्त..
जैनाचार्य श्री विजयराज जी म.सा. भी अनाथी मुनि के प्रतिमूर्ति ही हैं, जो अपने जीवन वृक्ष को संयम के अमृत से सींच रहे हैं। आप को भोगों का जहर कभी प्रिय नहीं रहा, इसी कारण से 17 अक्टूबर,1958 को बीकानेर में जन्में मात्र तेरह वर्ष की उम्र में आप संसारी जीवन से विरक्त हो गए। चौदह-पंद्रह वर्ष के मध्य में 15 फरवरी, 1973 माघ शुक्ला 13 के दिन समता विभूति आचार्य नानेश के कर कमलों से राजस्थान में गंगा शहर-भीनासर (बीकानेर) जवाहर विद्यापीठ के प्रांगण में करीब तीस हजार की जन समुदाय के बीच अपने पिता श्री जतनमल जी सोनावत, मातुश्री भंवरी देवी व छोटी बहन विदुषी साध्वी प्रभावती जी के साथ दीक्षित हो गए। आपको तरुणाचार्य की 31 जनवरी, 1999 में चित्तौड़ दुर्ग में और आचार्य पद की उपाधि 27 अक्टूबर, 1999 में मिल गई थी। संयम के प्रति यह आकर्षण बतलाता है कि आप बालयोगी है।
देश भर में मानवता का अलख जगा रहें है विजय गुरु..
सातवीं क्लास पास बालक आप आज जब आचार्य श्री विजयराज के रूप में जन-जन का आकर्षण केंद्र बने हुए हैं, तो यह सहज आभास होता है कि आप निकटभवी है, दृढ़ निश्चयी और सजग संयमी है। आपका साहित्य यांचन करते हुए लगता है कि आपका अध्ययन उच्च स्तरीय है, प्रवचन श्रवण करते हुए लगता है आप कुशल वाग्मी है। तत्व चर्चा और जिज्ञासा समाधान करते हुए लगता है कि आप गहरे आगम अध्येता हैं। परम्परा और पूर्वाचार्यों की धारणाओं के अच्छे जानकार हैं। वर्ष,1973 से अब तक आपने हजारों किलोमीटर का पद विहार किया है। देश के विभिन्न प्रांतों दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु के विभिन्न गांवों-नगरों महानगरों में विचरण करते हुए आप मानवता की अलख जगा रहे हैं। इस दौरान देश की अनेक राजनैतिक, सामाजिक हस्तियां आपके सम्पर्क में आई है। उनको तथा गैर राजनैतिक संगठनों के बीच आपने अपनी चारित्र निर्माण की आवश्यकता को प्रभावी अभिव्यक्ति में प्रस्तुत किया है।

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