समता विभूति जैनाचार्य नानेश का स्मृति दिवस तप त्याग, धर्म ध्यान से श्रद्धा आस्था के साथ मनाया गया…. नाना गुरु के मेरे जीवन में अनंत अनंत उपकार है -विजय गुरु

समता विभूति जैनाचार्य नानेश का स्मृति दिवस तप त्याग, धर्म ध्यान से श्रद्धा आस्था के साथ मनाया गया…. नाना गुरु के मेरे जीवन में अनंत अनंत उपकार है -विजय गुरु

जयपुर राजस्थान (अमर छत्तीसगढ) , 09अक्टूबर ।

पुण्योदयम् वर्षावास 2025 – विजय पथ-मुक्ति रथ के प्रवचन मण्डप जयपुर में शांत क्रांति संघ नायक वाक चिंतामणि, नानेश पट्टधर जैनाचार्य श्री विजय गुरुदेव की पावन निश्रा में समता विभूति जैनाचार्य श्री नानेश का स्मृति दिवस तप त्याग धर्म ध्यान से श्रद्धा आस्था के साथ मनाया गया।

आचार्य भगवन् ने आज मंगलाचरण के पश्चात अपने व्यक्तव्य की शुरुआत एक भजन के साथ की..

   *ओ ज्ञान के दिवाकर,*
   *मंजिल हमें दिखाना;*
   *सद्ज्ञान ज्योति देकर,*
   *जीवन सफल बनाना।*

आज का दिन विशेषतः पुज्य गुरुदेव आचार्य नानेश की स्मृतियां लेकर प्रस्तुत हुआ है!=आचार्य भगवन् श्री विजयराज जी म.सा.

• “गुरुदेव के हमारे ऊपर अनंत-अनंत उपकार है……”

आज पुज्य गुरुदेव समता विभूति जैनाचार्य श्री नानालाल जी म.सा. का स्मृति दिवस है। आज का दिन विशेषतः पुज्य गुरुदेव की स्मृतियां लेकर प्रस्तुत हुआ है। आज मैं पुज्य गुरुदेव आचार्य नानेश के बारे में कुछ कहने का भाव रखता हूं। गुरुदेव के हमारे ऊपर अनंत-अनंत उपकार है। उस उपकार को अभिव्यक्त करने के लिए आज मैं उत्तराध्ययन सूत्र के 31वें अध्ययन का प्रवचन गौण, या स्थगित कर रहा हूं।

व्यक्ति अपने व्यक्तित्व और उपादान से महान बनता है….

पुज्य गुरुदेव का पुरुषार्थ अतिशय था, जिससे उनके दिव्य और भव्य व्यक्तित्व का निर्माण हुआ। वे
समता विभूति जैनाचार्य नानेश के नाम से विख्यात हुए। पुज्य गुरुदेव की प्रतिभा बहुआयामी थी। बड़े-बड़े संत-आचार्य भी उनकी प्रतिभा का लोहा मानते थे। अपनी प्रतिभा के बल पर ही वे 19 वर्ष की उम्र में ही संयम जीवन, त्यागमय और निवृतिमय जीवन, तथा आदर्शमय जीवन में प्रवेश कर गए!

• “व्यक्ति तो सभी होते है, किन्तु अपने व्यक्तित्व का निर्माण विरले ही कर पाते है….”

संसार में अलग-अलग भाषाओं के शब्दकोश मौजूद है। एक शब्द ऐसा है जो सारे के सारे शब्दकोशों को ज्ञानवान बनाता है – वो शब्द है ‘संयम’। पुज्य गुरुदेव ने यौवन की दहलीज पर कदम रखते ही संयम अंगीकार करके अपने व्यक्तित्व का निर्माण प्रारंभ किया। व्यक्ति तो सभी होते है किन्तु अपने व्यक्तित्व का निर्माण विरले ही कर पाते है।

व्यक्तित्व का निर्माण अच्छे संयोगों के मिलने पर निर्भर करता है…..”

समता विभूति जैनाचार्य श्री नानेश को श्री गणेशाचार्य जी म.सा. का संयोग और सानिध्य मिला। उनका पहला चार्तुमास राजस्थान के फलौदी में हुआ था। उसी चार्तुमास में गुरुदेव का पहला लोच भी हुआ, जो बड़ा कठिन और दुखदाई रहा। गुरुदेव के नाजुक सिर और घने बालों की वजह से उनके सिर में फोड़े और फफोले पड़ गये थे! यह मुझे पुज्य गुरुदेव के जीवन चरित्र में पढ़ने को मिला। बड़े महाराज श्री शांतिमुनि जी म.सा. ने पुज्य गुरुदेव का जीवन चरित्र अपने हाथों से लिखा था।

जैन साधु की जीवनचर्या में सबसे कठिन दो कार्य होते है – पहला ‘पाद-विहार’, और दूसरा ‘केशलोच’…..

विचरण के दौरान मुझे एक सनातनी साधु ने पूछा कि जैन साधु की जीवनचर्या में सबसे कठिन कार्य क्या है? मैंने उन्हें बताया था कि जैन साधु की जीवनचर्या में सबसे कठिन दो कार्य होते है – पहला पाद-विहार, और दूसरा केशलोच। केश लोच तो फिर भी छः महीने में एक बार होता है, लेकिन पैदल विहार तो नित्य-प्रतिदिन चलता रहता है। ये दोनों ही विशेषतः ‘पाद-विहार’ यानी पैदल विचरण जैन साधु की सबसे कठिन चर्या है।

“संतों का व्यक्तित्व निर्माण कष्टों को सहने से होता है……”

यह सच है कि कष्टों को सहे बिना व्यक्तित्व का निर्माण नहीं होता। संतों का व्यक्तित्व निर्माण कष्टों को सहन करके ही बनता है। आप संसारी लोग तो जीवन में आए थोड़े से कष्ट में ही घबरा जाते है और बिलखने लग जाते है कि – “ये कष्ट मेरे जीवन में कहाॅं से आ गये, और इन्हें मैं कैसे सहन कर पाऊंगा?”

• गुरुदेव का पहला केशलोच उनके व्यक्तित्व की पहली परीक्षा थी, जिसमें वे पास हुए…

महापुरुष व्यक्तित्व निर्माण को अपने जीवन का प्रमुख लक्ष्य बनाते हैं। यह स्वाभाविक है कि व्यक्तित्व निर्माण में समय, समझ, सहिष्णुता, शक्ति और क्षमता लगती है। जब इन सभी बातों का समावेश हो जाता है, तब ही व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण होता है। गुरुदेव का पहला केशलोच उनके व्यक्तित्व की पहली परीक्षा थी, जिसमें वे पास हुए। गुरुदेव की जीवन यात्रा कष्टों तथा सहिष्णुता से भरी, जुड़ी हुई थी, जिसे उन्होंने सहनशीलता से पूरी की।

• “महापुरुषों के जीवन का पहला संकल्प कष्टों सहना होता है….”

संत महापुरुष सिंह (शेर) की तरह संयम धारण करते हैं और सिंह की तरह ही उसका पालन करते हैं। कुछ संत संयम लेते तो सिंह की तरह है, लेकिन पालते है सियार (गीदड़) की तरह। पुज्य गुरुदेव ने सिंह की तरह संयम लिया और सिंह की तरह ही उसका पालन किया।

आपश्री ने बताया कि उन्होंने सत्रह साल तक गुरुदेव के नजदीक रहकर उनके दर्शन किये। गुरुदेव के जीवन की अनेकों तथा बहुआयामी विशेषताओं में से कुछ मैं आज उनके स्मृति दिवस पर आपको बता रहा हूं।*

• परम पुज्य श्री नाना गुरुदेव के जीवन की प्रमुख विशेषताए….:

  1. ‘प्रसन्नचित्त स्वभाव’ – गुरुदेव हर समय और हर परिस्थिति में प्रसन्नचित्त रहते थे। उनको मैंने विषाद या निराशा में कभी नहीं देखा। मैं कहता हूं कि जब प्रसन्नता आती है तो जीवन में पवित्रता रहती है, और यही पवित्रता हमारे अंतरंग का दर्पण है। गुरुदेव की जीवन शैली, दृष्टि, सोच, चिंतन आदि सब कुछ पवित्र था।उनका हर कार्य पवित्रता से जुड़ा रहता था, और ये ही उनकी प्रसन्नता का राज था!
  2. ‘पवित्र दृष्टि’ – गुरुदेव की दृष्टि में कभी भी विकार, या अपवित्रता को नहीं देखा गया। ऐसे बहुत कम संत, या व्यक्ति होते हैं, कभी ना कभी कोई ना कोई विकार तो आ ही जाता है, लेकिन मैंने उनके दृष्टि में हमेशा पवित्रता और अविकारता ही देखी है।
  3. ‘पावन वाणी’ – किसी ने भी कभी गुरुदेव के मुंह से ‘रेकारा’ या ‘तूकारा’ करके कहते हुए नहीं सुना। हां, यह जरूर है कि जब कोई श्रावक- श्राविकाएं अविवेकी हो जाते थे तो उन्हें वे “श्रावक -श्राविकाएं निकम्मे है” कहकर संबोधित करते थे। इसी तरह जब कोई संत, या साध्वी विवेक और मर्यादा का दायरा छोड़ देते थे, तो वे उन्हें भी निकम्मे कह कर संबोधित करते थे। संभवतः निकम्मे कहने से उनका तात्पर्य निष्काम से होता होगा।*
  4. ‘प्रबल पुरुषार्थ’ – गुरुदेव के हर कार्य में गजब का पुरुषार्थ होता था। शिष्यों को पढ़ाने, या उनकी किसी बात का समाधान करने के लिए वे सदैव तत्पर और तैयार रहते थे, उन्हें यथोचित समय देते थे। कुछ संत तो अकारण ही मात्र उनका सान्निध्य पाने के लिए समझे हुए विषय को लेकर ही उनके पास चले आते थे। मैं तो कहता हूं कि उनका पुरुषार्थ बेजोड़ था!*
  5. ‘प्रखर व्यक्तित्व’ – बड़े-बड़े संत-आचार्य भी कहते है कि गुरुदेव जैसा व्यक्तित्व कहीं नहीं देखा जा सकता है। एक सो तीन डिग्री बुखार में भी वे रुग्ण शिष्यों की सेवा के लिए तैयार रहते थे। उनकी अनंत आस्था और श्रद्धा ही उन्हें सेवा करने की प्रेरणा देती थी।
  6. ‘बड़ा कृर्तित्व’ – गुरुदेव ने अपने जीवन में हजारों लोगों को व्यसन मुक्त करने जैसे अनेकों समाज के उपयोगी काम किए, और व्यसन छुड़ाकर उनके जीवन को नयी दृष्टि दी।

• “मैं पुज्य गुरुदेव की सेवा में आखिर में नहीं रह सका, उनके निरंतर दर्शन नहीं कर पाया……!”

आपश्री ने अफसोस भाव में कहा कि मैं पुज्य गुरुदेव की आखिर में सेवा में नहीं रह सका, उनके निरंतर दर्शन नहीं कर पाया। इस बात का दुख और मलाल मुझे पूरे जीवन भर रहेगा। लेकिन मन से मैं हर समय उनके नजदीक ही रहा। मैंने अपने जीवन में उनके जैसा अप्रतिम व्यक्तित्व और उनकी जैसी जबरदस्त साधना कहीं नहीं देखी।

गुरुदेव व्यावहारिक पढ़े-लिखे थे, उन्होंने अपनी प्रतिभा, क्षमता और योग्यता से उन्होंने अपने व्यक्तित्व को तराशा और संवारा। उनकी प्रतिभा से ही हम आज पाट पर बैठ कर बोलने और अन्य सब कुछ करने में सक्षम और समर्थ हुए हैं।

आचार्य श्री ने पुज्य गुरुदेव आचार्य श्री नानेश की स्मृति में एक भजन सुनाकर धर्मसभा का वातावरण ‘नानेशमय’ बना दिया..

   *नमो गुरु देवाय.. नमो नानेशाय..*

   *भज ले मन गुरुराज,*
   *जीवन इनसे बनता है;*
   *गुरुवर का बड़ा है नाम,*
   *संकट अपना टलता है!*

आपश्री ने अंत में फरमाया कि गुरुदेव का यह स्मृति दिवस अब अगले चार्तुमास में आयेगा। मेरा एक ही शौक है गुरुदेव की भक्ति और चिंतन करना। मुझे एक और भजन याद आ रहा है, जिसे मैं पुज्य गुरुदेव के चरणों में अर्पित करना चाहता हूं..

   *तू आधार मेरा.. मैं आधेय तेरा..*
   *सदा ही रहेगा, ये नाता.. ये नाता..* 
   *निराला..*
   *हमारा तुम्हारा.. तुम्हारा हमारा..!*

आचार्य भगवन् का आज का प्रवचन विशेषतः “आचार्य श्री नानेश के स्मृति दिवस पर आचार्य नानेश के जीवन” के विविध पहलुओं को स्पर्श करते हुए हुआ।*

आगम संगोष्ठी कल…

नवकार भवन के प्रवचन हाॅल में कल 10 अक्टूबर से एक तीन दिवसीय महत्वपूर्ण कार्यक्रम “आगम संगोष्ठी” प्रातः 9.00 से 12.00 बजे तक, तथा 2.00 से 4.00 बजे तक उसी से सम्बंधित कार्यशाला आयोजित होगी। इसलिए आचार्य श्री का प्रवचन तीन दिन 10 -11-12 अक्टूबर को स्थगित रहेगा।

तरुण तपस्वी श्रद्धेय श्री विनोद मुनि जी म.सा. ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि

• प्रज्ञा यानी बोध, आत्मबोध:

मुनिश्री ने फरमाया – प्रज्ञा परिषह का विषय चल रही है। प्रज्ञा यानी बोध, आत्मबोध। वैसे तो आत्मबोध कल्याण का बोध है, किंतु कभी-कभी यह आत्मबोध भी समस्या का कारण बन जाता है। आज हम आत्मबोध के नाम पर दूसरों को जानने, याद करने, याद रखने का प्रयास करते है।

“स्वयं का आत्मबोध हो जाए तो वो ही सबसे बड़ी प्रज्ञा है!”

क्या दूसरों को, उनके नाम को याद करना, या रखना ही हमारी प्रज्ञा की पहचान है? कतई नहीं! यह कर्म बन्धन का कारण बन जाता है। स्वयं का आत्मबोध हो जाए तो वो ही सबसे बड़ी प्रज्ञा है। ज्ञान और ध्यान के बारे में आत्मा का स्मरण होना ज्ञान है, और आत्मा का विस्मरण नहीं होना यह ध्यान है।

“स्वयं का स्मरण जहां होता है वो ही सच्चा ज्ञान है…”

ज्ञान का मतलब – केवल शब्दों को याद रखना ही काफी नहीं है। स्वयं का स्मरण जहां होता है वो ही सच्चा ज्ञान है। तथा स्वयं को नहीं भूलना, विस्मरित नहीं होने देना ही सच्चा ध्यान है।

• “संसार में पत्थर तो बहुत है, प्रतिमा और कलाकृति बनाने वाले प्रतिभावान विरले ही मिलेंगे…!”

आज पुज्य गुरुदेव आचार्य श्री का आचार्य पद आरोहण दिवस है, यह हमारे संघ का कृतज्ञता ज्ञापित करने का दिन है। सबसे पहले हमें आचार्य श्री के माता-पिता, तथा गुरुओं को कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए।जिन्होंने हमें इतने प्रतिभावान, लचीले, मुलायम, सरल, नम्र, लघुतावान, मिलनसार, वात्सल्यपूर्ण, और अहोभाव रखने वाले आचार्य भगवन् दिये!

गुरु की सेवा करने वाले शिष्य तो बहुत मिलेंगे, कठिन समय में शिष्यों का ध्यान रखने वाले गुरु विरले ही मिलेंगे!
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प्रश्नों के जबाव देने में लगी होड़, संघ ने विजेताओं को किया सम्मानित

प्रवचन के अंत में विदूषी महासती श्री नेहा श्री जी म.सा. नेचार्य श्री के प्रवचन से श्रोताओं से चार प्रश्न पूछे, जिसके सही जवाब दिये गये..*

प्रश्न 1.- व्यक्तित्व निर्माण कब हो सकता है?
• जवाब: “जब जीवन में समय, समझ, सहिष्णुता, शक्ति और क्षमता का समावेश होता है, तब ही व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण होता है!”

प्रश्न 2.- आचार्य श्री नानेश के स्मरण से किसके जीवन में क्या चमत्कार हुआ?
• जवाब: “बीच समुद्र में जब एक भक्त की नाव डगमगाने लगी, तो आचार्य श्री को स्मरण करने से भक्त की जान बच गई थी।”*

प्रश्न 3.- आचार्य श्री ने गुरुदेव नानेश की क्या विशेषताएं बताई?
• जवाब: – “आचार्य श्री ने गुरुदेव की निम्न विशेषताएं बताई – प्रसन्नचित्त स्वभाव, पवित्र दृष्टि, पावन वाणी, प्रबल पुरुषार्थ, प्रखर व्यक्तित्व और बड़ा कृतित्व।”

प्रश्न 4.- जैन संतों के जीवन चर्या की दो बातें क्या है?
• जवाब – “जैन साधु की जीवनचर्या में सबसे कठिन दो कार्य होते है – पहला पाद-विहार, और दूसरा केश लोच।

• तपस्याएं एवं प्रत्याख्यान…..

प्रत्याख्यानों की श्रृंखला में एकासना, बियासाना आयम्बिल, नीवीं, उपवास, बेले, तेलें, आदि प्रत्याख्यान हुए।

गतिमान तपस्याएं – श्रावक-श्राविकाएं…..

  1. नवरतन मल जी लूंकड़ के 30 उपवास के अग्रिम प्रत्याख्यान से आज -26वां उपवास गतिमान है।*
  2. वसंत जी कुम्भट के 20 उपवास के अग्रिम प्रत्याख्यान से आज -16वां उपवास गतिमान है।*

श्रावक श्राविकाओं सहित चारित्र आत्माओं की अन्य गुप्त तपस्याएं जारी है।

श्रद्धालु श्रावक श्राविकाओं का गुरू चरणों में जयपुर आने का सिलसिला जारी…..

धर्मसभा में गुलाबी नगरी जयपुर सहित देश-भर के विभिन्न कोनों से भारी तादाद में श्रद्धालु श्रावक श्राविकाओं का गुरु चरणों में जयपुर आने का सिलसिला लगातार बना हुआ हैं श्रावक श्राविकाएं गुरू भगवन्तों के पावन सानिध्य में धर्म ध्यान, तप त्याग कर मानव जीवन को सार्थक करने में पूरे समर्पण भावों से जुटे हुए है
संघ संरक्षक प्रदीप गुगलिया, संघ अध्यक्ष महेश दस्सानी, संघ महामंत्री नवीन लोढ़ा ने आभार व्यक्त किया।
(प्रकाश जैन, वरिष्ठ पत्रकार)

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