राजनांदगांव (अमर छत्तीसगढ़) 16 अक्टूबर। अटल बिहारी वाजपेयी स्मृति मेडिकल कॉलेज राजनांदगांव में रेबीज पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम छत्तीसगढ़ की रजत जयंती और एनएमसी के तत्वावधान में 14 अक्टूबर 2025 को आयोजित हुआ।
मुख्य विवरण:
मुख्य अतिथि: डीन डॉ. पी.एम. लूका।
आयोजन: स्व श्री अटल बिहारी वाजपेई स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय राजनांदगांव
विभागाध्यक्ष: डॉ. एन.के. तिर्की।
एसोसिएट प्रोफेसर: डॉ. प्रकाश खुंटे, डॉ. धीरज भवाननी, डॉ. धनंजय ठाकुर और डॉ. आशीष दुलानी।
अतिथि वक्ता: एम्स के अतिरिक्त प्रोफेसर डॉ. सबा सिद्दीकी और छत्तीसगढ़ के फिल्म कलाकार व पूर्व आईएमए अध्यक्ष डॉ. अजय सहाय।
प्रतिभागी: कार्यक्रम में स्टाफ नर्स, जूनियर रेजिडेंट डॉक्टर, इंटर्न और एमबीबीएस छात्रों सहित कुल 127 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।
प्रमाण पत्र: सभी प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र प्रदान किए गये
रेबीज एक जानलेवा बीमारी है, जो लगभग सभी गर्म रक्त वाले जानवरों को प्रभावित करती है। यह एक वायरल बीमारी है जो संक्रमित जानवर के काटने, खरोंचने या लार के संपर्क में आने से फैलती है। चूँकि यह मनुष्यों और जानवरों को समान रूप से प्रभावित करती है, इसलिए इसे नियंत्रित करने के लिए एक-स्वास्थ्य दृष्टिकोण (वन हेल्थ अप्रोच) की आवश्यकता होती है।
महामारी विज्ञान (एपिडेमियोलॉजी)
वैश्विक बोझ: रेबीज 150 से अधिक देशों में एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है, जिससे प्रति वर्ष हज़ारों मौतें होती हैं। दुनिया भर में लगभग 59,000 मौतें हर साल रेबीज से होती हैं, जिनमें से अधिकांश एशिया और अफ्रीका में होती हैं।
भारत में स्थिति: भारत में रेबीज का बहुत बड़ा बोझ है, जहाँ सालाना अनुमानित 18,000–20,000 मौतें होती हैं। ये मौतें अक्सर कमज़ोर और दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों को प्रभावित करती हैं, जहाँ स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच सीमित है। लगभग 30-60% मामले 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में होते हैं।
संचरण का स्रोत: भारत में 97% मानव रेबीज के मामले संक्रमित कुत्तों के काटने से होते हैं।
रोग का प्रसार: वायरस लार के माध्यम से फैलता है, जब एक जानवर दूसरे जानवर या इंसान को काटता या खरोंचता है।
नैदानिक विशेषताएँ (क्लिनिकल फीचर्स)
रेबीज के लक्षण दिखने के बाद यह लगभग 100% घातक होती है। रोग की शुरुआत में फ्लू जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।
प्रारंभिक लक्षण: बुखार, दर्द और घाव वाली जगह पर असामान्य झुनझुनी, चुभन या जलन का एहसास।
दो रूप: जैसे-जैसे वायरस केंद्रीय तंत्रिका तंत्र की ओर बढ़ता है, वैसे-वैसे दो नैदानिक रूपों में से एक विकसित होता है:
उग्र रेबीज (फ्यूरियस रेबीज): यह रेबीज का सबसे आम रूप है, जिसमें अति सक्रियता, उत्तेजित व्यवहार, भ्रम, मतिभ्रम, और पानी और हवा से डर (हाइड्रोफोबिया और एरोफोबिया) जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।
लकवाग्रस्त रेबीज (पैरालिटिक रेबीज): यह कम आम है और इसमें मांसपेशियों का धीरे-धीरे लकवा हो जाता है, जो घाव वाली जगह से शुरू होता है। यह अक्सर गलत निदान की ओर ले जाता है और रोगी को कोमा में डाल देता है।
निदान (डायग्नोसिस)
लक्षण दिखाई देने के बाद रेबीज का निदान करना कठिन होता है, क्योंकि कोई भी विश्वसनीय नैदानिक उपकरण उपलब्ध नहीं है।
अक्सर निदान पशु के संपर्क में आने के इतिहास के आधार पर किया जाता है।
प्रयोगशाला में पुष्टि के लिए पशु की मृत्यु के बाद मस्तिष्क के ऊतकों की जाँच की जाती है।
मस्तिष्क के ऊतकों में रेबीज वायरस के एंटीजन का पता लगाने के लिए डायरेक्ट फ्लोरेसेंट एंटीबॉडी टेस्ट (FAT) सबसे आम और विश्वसनीय तरीका है।
प्रबंधन
घाव की देखभाल: जैसे ही कोई जानवर काट ले, घाव को तुरंत साबुन और पानी से अच्छी तरह धोना चाहिए। यह वायरस को निष्क्रिय करने के लिए सबसे प्रभावी प्राथमिक उपचार है।
पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफीलैक्सिस (PEP): घाव की गंभीरता के आधार पर, यह चिकित्सा में शामिल है:
वैक्सीनेशन: तुरंत एंटी-रेबीज वैक्सीन दी जाती है।
रेबीज इम्यूनोग्लोबुलिन (RIG): यह सीधे घाव के आसपास लगाई जाती है ताकि वायरस को बेअसर किया जा सके। यह उन लोगों के लिए ज़रूरी है, जिन्हें पहले टीका नहीं लगा हो।
कोई प्रभावी इलाज नहीं: एक बार जब लक्षण विकसित हो जाते हैं, तो रेबीज का कोई प्रभावी इलाज नहीं होता है, इसलिए समय पर चिकित्सा देखभाल बहुत ज़रूरी है।
स्ट्रीट डॉग और पालतू कुत्तों का टीकाकरण
टीकाकरण का महत्व: रेबीज का उन्मूलन करने के लिए कुत्तों का सामूहिक टीकाकरण सबसे प्रभावी तरीका है। लगभग 70% कुत्तों का टीकाकरण होने पर हर्ड इम्युनिटी विकसित होती है, जो मनुष्यों और जानवरों दोनों में रोग को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक है।
स्ट्रीट डॉग का टीकाकरण:
भारत सरकार ने पशु जन्म नियंत्रण (कुत्ते) नियम, 2023 के तहत आवारा कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण का प्रावधान किया है।
सरकार और पशु कल्याण संगठन देश भर में आवारा कुत्तों के लिए एबीसी-एआरवी (एनिमल बर्थ कंट्रोल-एंटी रेबीज वैक्सीनेशन) कार्यक्रम चलाते हैं, जिसके तहत नसबंदी के बाद रेबीज का टीका लगाया जाता है।
पालतू कुत्तों का टीकाकरण:
भारत में पालतू कुत्तों के लिए रेबीज का टीकाकरण कराना अनिवार्य है।
यह कुत्ते के मालिक की ज़िम्मेदारी है कि वह अपने पालतू जानवर को नियमित रूप से टीका लगवाए, जिससे परिवार और समुदाय सुरक्षित रहे।
पिल्लों को आमतौर पर 12-14 सप्ताह की उम्र में पहला रेबीज का टीका लगाया जाता है, उसके बाद वार्षिक बूस्टर खुराक दी जाती है।

