जैन धर्म में दीपावली माहात्म्य….अंतर की कलुषता को मिटाने का पर्व दीपावली- गुरु अमृत शिष्य डॉ वरुण मुनि (D.LIT)

जैन धर्म में दीपावली माहात्म्य….अंतर की कलुषता को मिटाने का पर्व दीपावली- गुरु अमृत शिष्य डॉ वरुण मुनि (D.LIT)

पुष्कर राजस्थान (अमर छत्तीसगढ) 22 अक्टूबर।
(प्रकाश जैन,वरिष्ठ पत्रकार)

अंतर की कलुषता को मिटाने का पर्व दीपावली…
भौतिक एवं आध्यात्मिक जगत को जगाने के लिए अध्यात्म में रहे हुए तम को मिटाने के लिए दीपों का त्यौहार पावन पर्व पर दीपावली का शुभ आगमन हुआ है।
यह पर्व हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी अपने अंतर में रहे हुए कलुषता को मिटाने के लिए आया है। यह पर्व अनादि काल से भारतवर्ष में मनाया जा रहा है, परन्तु इस पर्व का प्रभाव संपूर्ण संसार में है। इस पर्व को हिंदुस्तान में रहने वाले सभी जैन, वैष्णव, सिख आदि धर्मानुयायी अपनी परंपरा के अनुसार मनाते हैं। इस पर्व को सभी धर्म जाति वर्ग के लोग अपनी-अपनी दृष्टिकोण के अनुसार मनाते हैं अर्थात महात्मा वर्ग इस पर्व को अपने अंतर जागरण के लिए मनाते हैं। कई सद्गृहस्थ अपने जीवनयापन के लिए लक्ष्मी आराधना के साथ मनाते हैं तो कुछ लोग केवल दैहिक मनोरंजन के लिए मनाते हैं।
यह पर्व सही एवं वास्तविक दृष्टि से अध्यात्म को जगाने के लिए आता है, पाप से पुण्य की ओर ले जाने के लिए आता है, परंतु आज के युग का प्रभाव कुछ ऐसा ही व्याप्त है कि जिसके फलस्वरूप व्यक्ति इस पर्व को केवल मनोरंजन, धन अपव्यय एवं प्रकृति को नुकसान करने के लिए मनाने लग गए हैं।
30 साल पहले दीपावली आध्यात्मिक विकास हेतु मनाई जाती थी…


मनोरंजन प्रेमी इस पर्व में नाना प्रकार की आतिशबाजी में धन व्यय कर के प्रकृति एवं व्यक्तियों को हानि पहुंचाते हैं। 30 वर्ष से पहले यह पर्व अधिकांशतया आध्यात्मिक विकास के लिए मनाया जाता था परन्तु इस आधुनिक युग के बाह्य विकास शील प्रभाव ने इन 30 वर्षों में इस पर्व का मूल उद्देश्य ही समाप्त करने पर गतिमान हो गया है।
जो बुद्धिजीवी होते हैं, मनीषी होते हैं, चिंतनशील होते हैं, वे इस पर्व के मूल उद्देश्य को सामने लाने के लिए आतिशबाजी आदि उद्देश्यहीन परंपरा का विरोध करते हैं।
रामायण के अनुसार भगवान श्री राम की लंका पर विजय प्राप्ति हेतु मनाया जाता है
रामायण के अनुसार यह पर्व मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के त्याग एवं साहस से लंका पर विजय प्राप्त करके पुन: अयोध्या लौटने पर स्वागत स्वरूप विजय स्वरूप मनाया जाता है।
लोक मान्यता के अनुसार इस पर्व में विशेष रुप से धन की देवी माता लक्ष्मी की विशेष रुप से भक्ति की जाती है, ताकि घर में सुख शांति एवं समृद्धि की प्राप्ति हो।
अंधकार को मिटाने वाला पर्व…
यह पर्व अमावस्या के दिन होने से अंधकार को मिटाने के लिए अधिकांश लोग अपने घर, दुकान, आराध्य स्थल में दीप प्रज्जवलित करने की अभिलाषा रखते हैं, यह एक लोक परम्परा है। इस परम्परा का ध्येय केवल प्रकाशित करने का है, चाहे वो प्रकाश आंतरिक हो या बाह्य।


दीपावली की जैन धर्म में खासी महता है,भगवान महावीर के निवार्ण कल्याणक के तहत मनाई जाती है…
जैन धर्म और दीपावली पर्व का संबंध भिन्न, विशिष्ट, रोमांचकारी एवं ऐतिहासिक है। दीपावली पर्व का जैन धर्म में अत्यधिक महत्व है। जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर, मनोविजेता, अपने सर्वज्ञता से जगत को आलोकित करने वाले, अनेक उपसर्ग परिषह को समभाव से सहन कर अपने समस्त कर्मों को जीतकर, सर्वज्ञता केवलज्ञान केवलदर्शन का उपयोग करके समस्त चराचर जीव जगत को निरंतर 16 प्रहर तक आत्मकल्याण का उपदेश देकर पावापुरी की पावन नगरी में अनेक राजा महाराजा चतुर्विध संघ के समक्ष रात्रि में मोक्ष मार्ग का मार्गदर्शन देते हुए प्रभु परमसुख मोक्ष स्थान को प्राप्त हो गए, निर्वाण को प्राप्त हो गए। प्रभु के निर्वाण कल्याणक होने से, अनेक देवताओं के आगमन से अमावस के अंधकार का नाश हो गया। उस समय सारे जगत में एक प्रकाश सी किरण व्याप्त हो गई, इसलिए तब से लेकर आज तक राजाओं ने इस दिवस को जीवन्त रखने के लिए अविस्मरणीय करने के लिए, एक किम्वदन्ती अनुसार इस दिन दीप प्रज्वलित कर प्रकाश का अनुभव कर दीपावली पर्व का उत्सव प्रवहमान हुआ।
परिवार,समाज एवम राष्ट्र की सुख शांति हेतु तप जप कर आत्मा को कुंदन बनाएं
जो भगवान महावीर स्वामी के सच्चे अनुयायी है, वे कार्तिक कृष्णा त्रयोदशी को अंतिम देशना श्री उत्तराध्ययन सूत्र जैनागम ग्रन्थ का वांचन करते है, जो कार्तिक कृष्ण अमावस्या को संपूर्ण होता हैं। जैन धर्म में तप का अत्यधिक महत्व है, इस ध्येय से वांचन के अंतर्गत यथाशक्ति तेला तप, आयम्बिल तप, पौषध तप की आराधना करते हैं।

अंतिम रात्रि दीपावली के दिन प्रभु का जाप स्मरण करते हैं, ताकि घर, समाज, राष्ट्र आदि में सुख शांति समृद्धि की प्राप्ति हो और अगले दिन (कार्तिक शुक्ला एकम) गौतम स्वामी के सर्वज्ञता प्राप्ति का उत्सव मनाते हैं। उपर्युक्त विधि जैन धर्म की है। जैन धर्म में बाह्यता से अधिक आंतरिक विकास का प्रचार है।
मेड इन इंडिया की वस्तुओं का उपयोग करें
हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी दीपावली का पावन प्रसंग आपके समक्ष उपस्थित हुआ है। इस पर्व को कुछ भिन्न रुप में मनाए जिससे व्यक्ति समाज राष्ट्र को विकास मिले।
अपने राष्ट्र का प्रभुत्व एवं आर्थिक स्थिति विकसित व स्थिर हो इसलिए अन्य देशों का उत्पादन न खरीदकर मेड इन इंडिया वस्तुओं का उपयोग करे, जिससे आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो। ऑनलाइन खरीददारी के बजाय अपने निकटस्थ व्यापारी से सामान खरीदे, क्योंकि आपके आने से ही उनके घर दीपावली मनाई जाएगी। प्राकृतिक रूप से जो आर्थिक व्यवधान राष्ट्र को मिला है, उससे व्यक्ति, व्यापारी और राष्ट्र शीघ्र संकट मुक्त होगा।
यह प्रकाश पर्व सभी के अंतर में व्याप्त तम को मिटाकर आत्मज्योति प्रकट करें। इसी मंगल आरजू के साथ दीपोत्सव – वीर निर्वाणोत्सव की हार्दिक बधाई।

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