जयपुर राजस्थान (अमर छत्तीसगढ) 29 अक्टूबर।
शांतक्रान्ति संघनायक, नानेश पट्टधर, जिन शासन गौरव, प्रज्ञानिधि, विश्व वल्लभ, वाक् चिंतामणि, समरस शिरोमणि, जन जन की आस्था के केन्द्र आचार्य भगवन् 1008 श्री विजयराज जी म.सा. तथा अन्य चारित्र आत्माओं द्वारा ‘प्रवचन मंडपम्’, जयपुर की धर्मसभा में आज दिये गये चार्तुमासिक प्रवचन-2025 के अंश..
आचार्य भगवन् ने आज मंगलाचरण के पश्चात अपने प्रभावशाली एवं सुमधुर प्रवचन शैली में विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए फरमाया..
• “त्रसकाय जीव अपनी शक्ति, बल और सामर्थ्य से आवागमन करते हैं, जो त्रस नामकर्म के उदय से संभव होता है!”-आचार्य भगवन् श्री विजयराज जी म.सा.
भगवान महावीर ने उत्तराध्ययन सूत्र के 31वें अध्ययन में चरण विधि का उपदेश दिया है। चरण विधि नामक इस अध्ययन में प्रभु ने आचरण की पद्धति, प्रक्रिया, प्रयोग और आचरण के परिणाम बतलाएं है। इसकी आठवीं गाथा में प्रभु फरमाते है – जो छः काया के जीवों की रक्षा, सुरक्षा और यतना करता है वो संसार में परिभ्रमण नहीं करता है।
छः काया के जीवों में पहले पांच पृथ्वीकाय, अपकाय, तेउकाय, वायुकाय और वनस्पति काय जीवों की व्याख्या अबतक हो चुकी है। आज मैं छठे और अंतिम ‘त्रस काय’ जीवों की व्याख्या करने का भाव रखता हूं।
आचार्य श्री ने आज अपने प्रवचन के प्रारंभ में फरमाया – पहले पांच काय जीव स्थावर काय कहलाते है। इनमें स्वयं में हलन-चलन, या गमनागमन करने की शक्ति नहीं होती है, कोई फोर्स करे तो ही ये स्थान परिवर्तन करते हैं। हलन-चलन, गमनागमन करने की -जैसे धूप से बचने के लिए छाया में जाने की शक्ति केवल त्रसकाय जीवों में होती है। त्रसकाय जीव अपनी शक्ति, बल और सामर्थ्य से आवागमन करते हैं, जो त्रस नामकर्म के उदय से संभव होता है।
• “संकल्प करों कि आप मन, वचन, काया से त्रसकाय जीवों की हिंसा स्वयं भी नहीं करेंगे और दूसरों से भी नहीं करवायेंगे!”
आचार्य श्री ने फरमाया – जो त्रसकाय के जीवों की रक्षा करते हैं, तथा विरति करते है, वो ही पांचवें गुणस्थान में आते हैं। जब तक त्रसकाय जीवों की विरति नहीं करते, आप पांचवें गुणस्थान को छू भी नहीं सकते। बेइद्रिय, त्रेइन्द्रिय, चौइद्रिय तथा पंचेंद्रिय सभी त्रस जीव है। जब हम इनकी हिंसा का त्याग करते हैं तब इनकी यतना होती है। इसलिए संकल्प करों कि आप मन, वचन, काया से त्रसकाय जीवों की हिंसा स्वयं भी नहीं करेंगे और दूसरों से भी नहीं करवायेंगे।
• त्रसकाय जीव:
जैन धर्म में त्रसकाय ऐसे जीवों को कहते हैं जो चल-फिर तथा हिल-डुल सकते हैं, और जिन्हें सुख व दुःख की अनुभूति होती है। इनमें मनुष्य, पशु, पक्षी, कीड़े-मकोड़े आदि शामिल हैं। इनकी इंद्रियाँ – स्पर्श, रसना, घ्राण, चक्षु और कर्ण, इन जीवों के शरीर की संरचना के अनुसार होती हैं।
इन्हें दो मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है – विकलेन्द्रिय – दो, तीन, या चार इंद्रियों वाले, और पंचेन्द्रिय – पांच इंद्रियों वाले।
• त्रसकाय जीवों के प्रकार:
• 1. बेइंद्रिय – ये दो इन्द्रिय जीव है, स्पर्श और रसना – जैसे केंचुआ, जोंक।
त्रेइन्द्रिय: स्पर्श, रसना और घ्राण इंद्रियों वाले – जैसे चींटी, खटमल।
चौइन्द्रिय: स्पर्श, रसना, घ्राण और चक्षु इंद्रियों वाले – जैसे मक्खी, मच्छर।
पंचेन्द्रिय – पांचों इंद्रियों स्पर्श, रसना, घ्राण, चक्षु और कर्ण इंद्रियों वाले जीव – जैसे मनुष्य, पशु, पक्षी, देव, नारकी।
• जैन धर्म में त्रसकाय जीवों के प्रति व्यवहार:
जैन धर्म में अहिंसा के सिद्धांत के कारण इन जीवों के प्रति अत्यंत करुणा और संरक्षण पर जोर दिया जाता है। वास्तव में जैन धर्म सभी जीवों के प्रति करुणा और अहिंसा के सिद्धांत पर ही आधारित है। इसका पालन करते हुए, त्रसकाय जीवों की हिंसा से बचने के लिए जैन अनुयायी विशेष सावधानी बरतते है।
यह सिद्धांत भोजन से लेकर दैनिक जीवन के अन्य सभी कार्यों में लागू होता है। जैसे – ऐसे किसी भी कार्य को करने से बचना, जो त्रस जीवों को भी नुकसान पहुँचाता है।
• त्रसकाय जीवों से विरति की दो शर्तें – निरपराध और निरपेक्ष:
आपश्री ने बताया कि जो अपनी निरपराध तथा निरपेक्ष भाव व बुद्धि से चलते-फिरते त्रस जीवों को नहीं मारने की धारणा करते हैं वो पांचवें गुणस्थान को प्राप्त कर लेते हैं। अपराधी हिंसा का प्रयोग करते हैं, जबकि निरपराधी इनकी हिंसा का विवेक व त्याग करता है।
• “राजा, महाराजा, और रंक भी भगवान महावीर के धर्म को स्वीकार कर सकते है!”
आपश्री ने बताया कि राजा, महाराजा, और रंक भी भगवान महावीर के धर्म को स्वीकार कर सकते है। जब राजा महाराजाओं को यह समझ में आ जाता है कि सत्ता साम्राज्य उनका नहीं है, यह तो पैतृक है, वे तो मात्र इनके उपभोक्ता है। ये उनका धर्म नहीं है, पुर्वजों से प्राप्त साम्राज्य का भोग सिर्फ कर्तव्य पालन के लिए कर रहे हैं। उन्हें जब इस आत्मज्ञान का बोध हो जाता है तो वे गुरु भगवंतों के पास पहुंच कर 12 व्रत धारण कर लेते हैं।
• गरीब को भी समझ आ जाए तो वो भी व्रतधारी बन सकता है, और अमीर को समझ नहीं आए तो वो व्रतधारी नहीं बन सकता!”
भगवान महावीर का धर्म बड़ा फ्लेक्सिबल है जिसको सामान्य या असामान्य, गरीब या अमीर कोई भी ग्रहण कर सकता है। ये तो अपनी-अपनी समझ की बात है। यह गरीब को भी समझ आ जाए तो वो भी व्रतधारी बन सकता है, और अमीर को समझ नहीं आए तो वो व्रतधारी नहीं बन सकता!
• त्रसकाय जीवों की विरति कैसे प्राप्त हो? चार भाव – प्रवृत्ति, प्रभाव, परिणाम और पुनरावृत्ति:
• प्रवृत्ति, यानी क्रिया – हमारी प्रवृत्ति में ही त्रसकाय की सारी हिंसा का रूप समाहित है। प्रत्येक जीव किसी न किसी क्रिया में सक्रिय रहता है। एक मात्र सिद्ध भगवान ही अक्रिय है। आप चाहे तन से कोई प्रत्यक्ष प्रवृत्ति नही कर रहे हो, फिर भी अपने व्यवहार और हाव-भाव से आप प्रवृत्ति कर रहे होते हैं। हमें अपनी प्रवृत्ति पर नजर रखनी होगी। हमारी ‘प्रवृत्ति’ त्रसकाय जीवों पर ‘प्रभाव’ से जुड़ी होती है और प्रवृत्ति के अनुसार ही ‘परिणाम’ देती है। विपरित प्रभाव व परिणाम हो तो उस प्रवृत्ति की ‘पुनरावृत्ति’ नहीं होनी चाहिए!
हमें अपनी प्रवृत्ति पर ध्यान देना पड़ेगा कि वो कैसे चल रही है। अगर जीव हिंसा हो रही है तो उसका प्रभाव व परिणाम शुभ, या अच्छा नहीं होगा। जब परिणाम बुरा आता है तब होश आता है कि ये क्या हो गया? या ये कैसे हो गया?
• शांत क्रांति संघ की पहचान:
• “यह कोई धर्मशाला नहीं है, धर्मस्थान में नियमों के अनुसार आना, बैठना, रहना और गमनागमन करना चाहिए!”
धर्म स्थान में श्राविकाओं को खुले सिर नहीं रहना चाहिए, ये शोभास्पद नही लगता। सिर ढ़का हुआ, मुंह बंधा हुआ और हाथ खाली व खुले रहने चाहिए। मोबाइल, सेल की घड़ी व चाबी आदि इलैक्ट्रोनिक उपकरण बाहर छोड़कर आना चाहिए। यह कोई धर्मशाला नहीं है। धर्मस्थान में नियमों के अनुसार आना, बैठना, रहना और गमनागमन करना चाहिए। धर्मस्थान में धार्मिकता से प्रवेश करोगे तभी आपकी शिक्षा पूरी होगी!
• प्रसंग – “मैं अज्ञानी था, और गुरुदेव के सानिध्य से ही यह संभव हुआ!”
प्रसंग – आपश्री ने गुरुभक्त धर्मीचंद जी कोठारी तथा LIC के एक अधिकारी नसीराबाद निवासी मित्तल साहब के एक प्रसंग से जीवन में त्रसकाय जीवों की विरति, तथा हिंसा के त्याग को समझाने का प्रयास किया। बीस-पच्चीस साल पहले वीरनगर, दिल्ली प्रवास के दौरान आचार्य श्री की धर्मीचंद जी कोठारी के साथ आए मित्तल साहब से मुलाकात के दौरान पता लगा कि मित्तल जी मच्छरों को अपना दुश्मन समझते थे, तथा देखते ही उन्हें मार देते थे।
आचार्य श्री ने मित्तल जी को बताया कि मच्छर भी जीव है और उन्हें भी जीने का हक है। उन्हें समझाने के लिए जीव दया के तरह-तरह के उदाहरण दिए। फिर मित्तल जी को मच्छरों को नहीं मारने का संकल्प दिलाने की कोशिश की। बड़ी मुश्किल से मित्तल साहब ने नियम लिया। आपश्री ने उनसे कहा कि नियम का पालन करोगे तो परिणाम, या फल कुछ समय बाद अवश्य मिलेगा।
ब्यावर की तरफ विचरण के दौरान आचार्य श्री की नसीराबाद में एक बार फिर मित्तल साहब से मुलाकात हुई तो पता चला कि नियम लेने तथा उसका पालन करने के बाद मित्तल जी के जीवन में कुछ अप्रत्याशित और सार्थक बदलाव आए.. 1. उनके पेट्रोल पंप में NOC की आई रुकावट दूर हो गई तथा एक से बढ़कर उनके तीन पेट्रोल पंप हो गये, 2. परिवार में लम्बे समय से चल रही खटपट दूर होकर शांति हो गई, 3. उनके हार्ट का आप्रेशन साता पूर्वक तथा मितव्ययिता से हो गया।
मित्तल साहब ने प्रतिक्रिया में आचार्य से कहा – “नियम ने मेरे जीवन में कितनी बड़ी प्रतिक्रिया दी है। आज मैं मच्छरों के दुश्मन की जगह मच्छर प्रेमी हो गया हूं। मैं अज्ञानी था, और गुरुदेव के सानिध्य से ही यह संभव हुआ!”
उपरोक्त प्रसंग से स्पष्ट होता है कि जीवों की यतना करने से जीव भी किसी न किसी रूप में आपकी रक्षा करते हैं। हिंसा से वैर बढ़ता है। त्रसकाय की विरति है – निरपराध और निरपेक्ष चलते-फिरते जीवों को मारने की बुद्धि नहीं रखना। ये जीव अपनी भूख-प्यास माटाने के लिए यह सब करते हैं। खून पीना ही मच्छर का भोजन है।
• “ये न्यायाधीशों तथा सरकार का अज्ञान है!”
आपश्री ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले पर रोष व्यक्त करते हुए कहा कि कुत्ते और कबूतर जैसे जीवों को मारने का फैसला अत्यंत अत्याचार भरा है। ये न्यायाधीशों तथा सरकार का अज्ञान है। होना तो यह चाहिए कि इस समस्या का उन्हें कोई अहिंसक समाधान करना चाहिए। नहीं समझ में आए तो धर्म गुरुओं से सलाह लेनी चाहिए।
• “आजकल नैतिकता और मानवता का स्तर गिरता जा रहा है!”
हजारों सालों से मानव और पशु पक्षी साथ-साथ रह रहे हैं। इनका उपकार तो देखों – सुअर हमारी अशुद्धि खाकर हमें गंदगी फैलने तथा बीमारियों से बचाता है। हमें इन पशु-पक्षियों का आभार मानना चाहिए। जैसे हमें जीने का हक है वैसे ही जीवों को भी जीने का हक है। आजकल नैतिकता और मानवता का स्तर गिरता जा रहा है। दुखी के दुख में दुखी होना, तथा सुखी के सुख में सुखी, या खुश होना ही नैतिकता और मानवता है।
• “मैं किसीका विरोधी नहीं हूं, लेकिन जहां हिंसा की बात होती है, वहां मेरी रूह कांपने लग जाती हैं!”
आज शिक्षा के नाम पर कितना घपला और घोटाला हो रहा है, जिसमें नैतिकता का नामोनिशान नहीं है। फिर वो शिक्षा पूरी कैसे कही जा सकती है। आजकल इन न्यायधीशों का दिमाग आधा है, पूरा होता तो आज भारत सोने की चिड़िया होता। सभी जीवों को जीने का हक है, हमारा दायित्व है कि हम उनकी रक्षा करें। जीवों को जीवनदान कितना बड़ा वरदान बन सकता है। मैं किसीका विरोधी नहीं हूं, लेकिन जहां हिंसा की बात होती है, वहां मेरी रूह कांपने लग जाती हैं।
आचार्य श्री ने श्रोताओं को लेने लायक सात प्रतिज्ञाएं बताई..
• 1. चमड़े से निर्मित वस्तुओं की उपयोग नहीं करना।
• 2. रेड मार्क वाली खाद्य वस्तुओं, दवाईयों तथा अन्य वस्तुओं को काम में नहीं लेना।
• 3. वेज-नॉनवेज मिक्स होटल में खाना नहीं खाना।
• 4. मसाज पार्लरों में नहीं जाना।
• 5. हुक्का पार्टी का सर्वथा निषेध करना।
• 6. पोर्न का त्याग और बहिष्कार करना।
• 7. बूम फायर का त्याग करना।आपश्री ने श्रोताओं से कहा – इन पचकानो को आज यहां से करके ही जाना। बोलों करोगे क्या? धर्मसभा में सन्नाटा छा गया!
• धर्म गणित की तरह है जो अपरिवर्तनशील है!”
आपश्री ने बताया कि विज्ञान अधूरा रहता है। यह इतिहास की तरह है जो निरंतर बदलता रहता है। जबकि धर्म गणित के समान है जो अपरिवर्तनशील है। हजारों सालों से गणित की संख्याएं वही है, बिलकुल नहीं बदली।
• आपश्री द्वारा आज प्रगट किये गये महत्वपूर्ण शुभ विचार:
“पिछले कुछ समय से जैनियों में पैसा कमाने की होड़ मची हुई है। वे भूल रहे हैं कि पुण्य और भाग्य से ज्यादा कुछ नहीं मिलता!”
“पैसा और सम्पत्ति चले जाने या चोरी हो जाने पर लोग रोते-बिलखते है। ज्ञानी कहते है – “तेरा होता तो वो जाता नहीं, और जो गया वो तेरा नहीं!”
“खून से भरा हुआ कपड़ा कभी खून से साफ नहीं होता!”
“लोग अमरूद मीठा देखकर तो खरीदते है, फिर उस पर नमक-मिर्च लगाकर खाते हैं!” आचार्य श्री ने यह युक्ति अपनी सलाह को लोगों द्वारा बढ़ा-चढ़ाकर फैलाने के संदर्भ में कही!
“रो-रो कर, गिन-गिन कर और गिना-गिना कर दिया धन दान नहीं होता! आज घोषणा की है तो वो यथासंभव कल पूरी होनी चाहिए!”
आचार्य श्री ने अंत में फरमाया – थोड़ा सा चिंतन करें कि हमें असंख्य असंख्य जीवों की हिंसा से अपने आप को बचाना है। अगर ऐसा करते हैं तो हम संसार परिभ्रमण से बच सकते हैं। त्रसकाय जीवों की हिंसा का त्याग करके हम अच्छे, पक्के और सच्चे साधु, श्रावक और साधक बन सकते हैं।
“जिनवाणी के विरुद्ध मैंने कुछ बोला हो, और आपको दुख पहुंचा हो तो – मिच्छामि दुक्कड़म्। यदि अच्छा लगा हो तो उसे स्वीकार करके अपने जीवन में धारण कर लें!”
आज छः काया के जीवों की यतना का विषय पूर्ण हुआ। कल मैं छः प्रकार के आहार की यतना और परीणाम की चर्चा करने का भाव रखता हूं!
• आचार्य भगवन् का आज का प्रवचन विशेषतः – छः काया के जीवों में त्रसकाय जीवों की रक्षा व यतना के विविध पहलुओं को स्पर्श करते हुए हुआ।
जैन धर्म में सभी छः काया के जीवों की रक्षा को महत्वपूर्ण माना जाता है। इसलिए अहिंसा का पालन करने वाले साधक इन सभी जीवों को किसी भी प्रकार की हानि पहुँचाने से बचते हैं!
▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬सर्वप्रथम आज धर्मसभा में आदर्श सेवारत्न तरुण तपस्वी श्रद्धेय संत श्री विनोद मुनि जी म.सा. ने संबोधित किया।
आपश्री ने फरमाया – तीन शब्द है – सुख, दुख और आनंद। ज्ञानीजन कहते है – दुख पाप कर्म के उदय से, सुख पुण्य कर्म के उदय से, तथा आनंद धर्म को जीने से मिलते हैं। किस समय कौन-से कर्म का उदय होना है और जो हम चाहते हैं क्या वो होगा, या नहीं, यह हमारे हाथ में नहीं है। पाप कर्म का उदय हमारे जीवन में आ जाएं तो उसे झेलने की क्षमता हममें आ जानी चाहिए।
मुनिश्री ने फरमाया – कर्म करने में हम स्वतंत्र है, लेकिन कर्म का उदय में आना हमारे बस में नहीं है। धर्म कब करना है, कैसे करना है, धर्म में कब जीना है, ये सब तो हमारे हाथ में है। किसी भी उम्र, मौसम, अकेले या समूह में जब चाहे तब मैं धर्म में जी सकता हूं। यह कहने, बोलने या लिखने की आवश्यकता नहीं है। धर्म को जीने का विषय मेरे हाथ में है। इसी तरह सुख और दुख मेरे हाथ में नहीं है लेकिन आनंद में आना मेरे हाथ में है। सुखी और दुखी होना भी मेरे हाथ में है। दुख कर्मजन्य है, जबकि दुखी होना विचार जन्य है, और दुखी नहीं होना ध्यान जन्य है।
विषय परिषहों का चल रहा है – अगला परिषह है – निषज्ञा परिषह। निषज्ञा यानी बैठना, या बैठने का स्थान। जब खड़े रह कर या बैठ कर साधना करते समय कोई उपसर्ग आ जाए तो अचपलता से स्थिर रहना चाहिए। काया से स्थिर, वचन से मौन और मन से साधना करते रहना चाहिए।
हम सबसे पहले चाहते हैं कि हम दुख मुक्त रहे। दुख के दो कारण है – शिक्षा के दुख और परीक्षा के दुख। जब हमारे कार्य में कमियां रह जाती है, या गलती हो जाती है, और हमें दुख हुआ है तो उससे सबक लेना शिक्षा का दुख है। और जब हम साधना, आराधना, सामायिक, प्रतिक्रमण करते हैं तब जो कष्ट आते हैं ये परीक्षा के दुख है।
▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬है▬▬▬▬▬▬प्रवचन के अंत में आदर्श सेवारत्न तरुण तपस्वी संत श्री विनोद मुनि जी म.सा. ने आचार्य श्री के प्रवचन से श्रोताओं से चार प्रश्न पूछे, जिसके सही जवाब दिये गये..
*प्रश्न 1.- पांचवें गुणस्थान में कैसे जाया जाता है?
*• जवाब: पांचवें गुणस्थान में त्रसकाय जीवों की रक्षा-सुरक्षा और यतना करके तथा इनकी हिंसा से विरति करके जाया जाता है!**प्रश्न 2.- “मच्छरों का दुश्मन मच्छरों का मित्र बना!” वे आचार्य श्री से कहां सम्पर्क में आए, वे कहां के रहने वाले थे तथा उनकी गौत्र क्या थी?
*• जवाब: नसीराबाद, राजस्थान के रहने वाले LIC के अधिकारी मित्तल साहब आचार्य श्री के जैन कालोनी, वीरनगर, दिल्ली प्रवास के दौरान सम्पर्क में आए थे!**प्रश्न 3.- विज्ञान और धर्म में क्या अंतर है?
*• जवाब: जहां विज्ञान इतिहास की तरह है जो परिवर्तनशील होता है, वहीं धर्म गणित की तरह है जो सदैव अपरिवर्तित रहता है!**प्रश्न 4.- मानवता की क्या पहचान है?
*• जवाब: दुखी के दुख में दुखी होना, तथा सुखी के सुख में सुखी होना ही मानवता की पहचान है।*
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